
मनचीता ताप है
इन धूपीले दिनों में
जिसे चाहने पर ओढ़ना है
अनिच्छा होने पर, मुख मोड़ लेना…
भोर में खिले मयंक को देखा-अदेखा किया जाता है जैसे .
जनवरी विदा होकर ,फरवरी को सौंप गयी
लंबे पहरों की बागडोर
अलसुबह ही नीड़ में फंख फड़फड़ाकर
साँझ तक पाँव पसारे
यहाँ-वहां से अलस कर सिमटता है
उजाला अब
कैक्टस पर नूर है ,
मिर्च के पौधे में नन्हें-सफ़ेद फूल से
चमक-दमक
मैना सर्दियों की ख़ुमारी में
इन दिनों भी टपकते नल के पास
चहलकदमी करती ,भोजन तलाशती है
उसकी आंखों के गिर्द पीला काजल
लुभावना
हवा में गुड़ पकने की गंध है ,
खजूर का गुड़
गले में खराश जगाता
दूर से ही
तन,आधी धूप,आधी छांह में सुस्ताता,
मन,दामोदर किनारे मद्धम चाल से उसकी
मछलियों से बतियाता,
पानी में हाथ डाल उन्हें सहलाता
सुनता विलंबित ख़्याल कोई
इस नदी की रेत पर सुगमता से चलना दूर तक
गंगा की महीन बालू जैसे पैर उलझते नहीं
यहां मेरे
मनचीती धूप में देखना …
वसंत ,अपनी ही छाया पर
नीम की पीली पत्तियों सा
बिखरता-डोलता,विचरता रहता है
हवा के रुख़ पर
इन दिनों
चित्र-गूगल साभार