Sunday, January 8, 2012

छोटा कमरा



2009 में इस कहानी के कुछ अंश ब्लाग पर आ चुके हैं । आज पूरी कहानी --छोटा कमरा --


सुबह होने में ज़रा सी देर है अभी .खिड़की के सींखचे थामे , बावली विदा होती रात का अवसान देख रही है .ये एक पूरे चाँद की रात है ,यहां बादलों की जकड़न में चाँद को उगने की मनाही है .नीचे , क्यारी में लगे गंधराज के ऊंचे पेड़ की एक डाल, बावली के कमरे की खिड़की के अन्दर उचक कर झांक रही है . शुरुआती मार्च की रातों में बावली की नींद बैरी हो जाती है ।

"हरि दिन तो बीता शाम हुई रात पार करा दे,बीता मेरा काल तो बीता पूर्ण पार करा दे"....

मेघ भरे आसमान को निहारते हुए बावली धीमे-धीमे गा रही है । उसके स्वर बहुत कमज़ोर हैं , वो शायद ख़ुद भी उनकी अनुगूँज सुनना नही चाहती. मगर उड़के हुए किवाड़ के पीछे कोई है ,जो सुन रहा है ……जिसकी सिसकी सुनकर बावली पलटती है .अधखुले पल्ले के पीछे "टुकुन दी" ,हतप्रभ उसे निहार रहीं हैं ,उनकी सजल आँखें देखकर बावली मन ही मन काँप जाती है .वह उनका हाथ पकड़कर उन्हें पलंग पर बिठा देती है और ख़ुद उनकी गोद में मुंह छिपा लेती है ।

टुकुन दी , इस आश्रम की नींव हैं और वे बावली को निरीह जान, माँ की तरह अपनी छाया में रखती आयी हैं । बावली का सौम्य और सुरूचिपूर्ण व्यवहार उन्हें सदा आकर्षित करता रहा है

"तुम गूंगी नहीं हो बावली "..... टुकुन दी ने उसके बालों पर प्यार से हाथ फेरते हुए कहा ……तुम्हे इस वृद्ध ग्राम में लोगों की सेवा करते हुए दस वर्ष होने आए ,मगर आजतक यहाँ किसी नें तुम्हे बोलते हुए नहीं सुना। हमसब अबतक यही जानते थे कि ईश्वर ने तुम्हारे साथ अन्याय किया है ।
सालों पहले मंदिर की सीढियों पर, तुम हमें मौन बैठी मिली थीं ,और हमने तुम्हे यूँ ही स्वीकार लिया था. पर आज देखकर चकित हूँ कि इतनी सुन्दर वाणी होते हुए भी तुम सदियों की खामोशी अपने सीने में छुपाये हो..... बावली ने सर उठाकर कातरता से उनकी ओर देखा ...

" टुकुन दी …कहते-कहते उसके होंठ भींच गए.

"हाँ बावली बोलो!
टुकुन दी नें धैर्यपूर्वक , हक जताते हुए बावली से कहा …
आश्रम की प्रार्थना शुरू होने में अभी थोड़ा विलम्ब है .तब तलक मै जानना चाहती हूँ ,क्योंकर इस तरह कोई ख़ामोश हो जाता है"
बावली उठकर दोबारा खिड़की पर खड़ी हो गयी ,उसका गला रुंघ गया ,और जो आवाज़ टुकुन दी तक छनकर आयी ,उसमें वे मात्र एक ही शब्द सुन सकीं -"जोगी"

इस एक शब्द के झोंके से, बावली के ज़र्द पड़े अतीत के सभी पृष्ठ फड़फड़ाकर टुकुन दी के सामने खुलने लगे -

“जोगी” नाम से पुकारती थी " बावली" उन्हें .बावली ने एक बहुत लम्बी साँस अपने अंदर सहेजते हुए साहस से कहना शुरू किया . जोगी के पास विरासत मे पुरखों से मिला एक "छोटा कमरा" था । वे, कहीं भी जायें , कितने ही शहर ,मकान , मोहल्ले बदल ले, वह छोटा कमरा सदा उनके साथ रहता । उनका अन्त:पुर ,उनकी तमाम ख़ामियों,ख़ुशियों, जिम्मेंदारियों से उबरने का एक मात्र सुरक्षित स्थान , उनका अपना--" मन"-उनका "छोटा कमरा" । वहां वे किसी के जवाबदेह नहीं होते, जहां उन्हे स्वयं से कदापि लाज न आती ।

वह छोटा कमरा ,जोगी को -शक्ति देता था ,संसार के दूसरे अदना प्राणियों का माखौल बनाने के वास्ते. ख़ासकर उनकी, जिनके पास थे बड़े-बड़े विशाल कक्ष ,और जो लोग अपने मनोभाव छिपा नहीं पाते थे । जो हँसने- रोने के कृत्रिम तरीकों को अपनाने के बजाय , दुनिया के सामने ठीक वैसे ही प्रस्तुत हो जाते, जैसे ईश्वर ने इंसानों में भावातिरेक से उबरने के सामान्य नियम बनाये थे । जोगी, उस छोटे कमरे से अपनी सभी गुत्थियाँ सुलझाकर आँख की महीन से महीन नमी भी हथेली पर सुखाते हुए दरवाज़े की सांकल खोलते, और साधारण ढ़ंग से रोने-धोने वाले प्राणियों को गहरी उपेक्षा से देखते । अपनी शरणस्थली का ये सुख केवल "वे" ही जानते थे ।


जीवन के खास दिन व तारीख़े जोगी याद नहीं रखते थे और, जो उन्हें याद भी रहती हों , तो वे उन्हे मनाने व जताने से परहेज करते । वे, उन व्यक्तियों को कभी महत्व नहीं देते जो ,जोगी को सबसे अधिक चाहते थे .

टुकुन दी ,चुपचाप सुनतीं हैं , बावली का ह़र कहा -अनकहा ....बावली आँखें बंद किये एक-एक पर्त खोलती जाती -कि जैसे ये कहानी किसी दूसरी बावली की हो ……

जोगी को बख़ूबी इल्म था- कि उनका प्रेम गाढ़ा,चिपचिपा और कसैला असर रखता है, ख़ासकर उस निर्दोष के चित्त पर ,जिसका नाम" बावली" था . चैत की एक डूबती सांझ, बंजारी हवा यूँ ही बहा लायी थी बावली को अपने साथ-जोगी के पास । जोगी नें अलमस्त बावली को टोक कर कहा- " रह जाओ यहीं" ।

बावली सुनती रही ,जोगी कहते रहे -" तुम मेरे लिए ही बनी हो" ।" मेरा –तुम्हारा अब कोई दूसरा उपाय नहीं" । बावली , मन मेंहदी रचा कर बिना डोर, उसी पल उनसे बंध गयी थी । वह अपना अतीत भूल कर , उनके धूप –छाँव ओढ़कर चलने लगी थी , साथ- साथ, दम भर दम …… मगर जोगी के उस छोटे कमरे में उसका प्रवेश भी निषेध था । वहाँ जोगी अकेले ही जाते और लौट आते ।



ख़ामोशी ओढ़ना-बिछाना जोगी का बरसों का नियम था । स्मृतियों के गहरे-अंधेरे कुएँ मे वे अकेले ,प्रसन्नचित्त डूबते-उतराते रहते। कोई उन्हे हाथ पकड़ बाहर खींचना भी चाहता तो उनकी चुप्पी का चुम्बक, खुद उसे भी किसी गहन कोने मे खींच ले जाता । कभी कभी उनकी उपस्थिति -अनुपस्थति में तब्दील हो जाती . वे दिन बावली के लिए कठिन होते .वह विचलित हो जाती और अनायास ही जोगी से मिल रही उपेक्षा से वह - सात समन्दर,उजले पहाड़ और अमलतास के जंगलों के पार , बहुत पीछे अपनी तोड़ी और छोड़ी हुई हदों के अवशेष खोजने लगती.


अवहेलना करना जोगी की फ़ितरत थी , और उसे न सह पाना बावली की कमज़ोरी . ऐसे समय उसे याद आ जाता --"ऊपरी होंठ पर उगा हुआ छाला, जो बोलते वक्त लाख बचाने पर भी दोनों होंठों के बीच आ ही जाता" । बावली उस पल दर्द से बिलख जाती ।

टुकुन दी ने गौर किया .....बावली का दम फूलने लगा है ,मगर वह अविराम बोलती जा रही है .एक सधी हुई लय में --


जोगी कभी-कभार बावली से पूछते -तुम कौन हो ?

बावली उत्तर देती- "रंगरेज़ हूँ" जोगी . तुम्ही ने तो कहा था -"मेरी हद रंग दे ,अनहद भी रंग दे "

और मन ही मन सोचती- तुम्हे रंगते-रंगते "मेरे चारो पहर मनभावन रंग गए" जोगी

जोगी कहते- बावली "तुम क्या कर रही हो ,कभी सोचा है? "

बावली कहती -तुम ही बता दो

जोगी कहते-" ये प्रेम है, बावली "

बावली मन ही मन दोहराती -ये" भक्ति" है जोगी

"बावली मुझे छोड़कर कभी मत जाना" -जोगी कोहरे भरी सुबह बावली से वादा लेते .

"मै अडोल हूँ जोगी .जब चाहे आजमा लेना" -बावली मुस्कुरा कर जवाब देती



जोगी को बिल्लियॉ पसन्द थी । काली, मोटी, हरी आँखों वाली बिल्लियॉ , जो चुपचाप पड़ीं रहतीं और बनातीं शिकार की नयी-नयी योजनाएँ । ऊपर से एकदम सपाट ,भाव हीन और अंदर से शातिर चेहरे वाली बिल्लियाँ ।

जोगी बावली से कहते –“बिल्लियॉ सब समझती हैं । उनकी आँखें बहुत कुछ जानती हैं ,। बिल्लियॉ धीर गंभीर होती हैं, सोच समझकर कदम उठाती हैं इसलिये मुझे बिल्लियों से लगाव है “।

बावली सब सुनती रहती, मन ही मन गुनती रहती –“ मैं बिल्ली क्यों न हुई “? फिर आंगन में टुकुर-टुकुर करते सफ़ेद कबूतरों को देखती जिन पर जोगी का अपार स्नेह था ,जिनके पँख उन्होने बेहद ख़ूबसूरती से कुतर दिये थे . जिससे न तो परिंदे उड़ सकें ,न ही भद्दे लगें ।

"जोगी के प्रेम में जकड़न थी , बंधन था ,पर उनका स्वभाव था अघोरियों सा उन्मत्त और स्वतंत्र । वे बांधना जानते थे, बंधना नही ।"

बावली टुकुन दी को बताती …

जोगी के अनूठे प्रेम में क्षमा शब्द वर्जित था । वे जब कभी गिनाते , बावली की भूलें तो वह गिनती पोरों पे वे धानी बसंत.... जो अनजाने ही खिल गए थे, बरसों पहले, जोगी के स्नेह से उसके जीवन में । वह, खोजती वे सारे चटख़ रंग, जो जोगी के कोमल सामीप्य से उसके चहरे पर उजास बिखेर जाते थे।
बावली नदी की सहजता से जोगी के पथरीले स्वभाव की गुफाओं में बह रही थी . वह अनभिज्ञ , हर बार उनकी खींची हुई लक्ष्मणरेखा में खुद को समेट लेती और अपने मन का एक- एक हिस्सा, खुशी- ख़ुशी उन्हे सौंपती जाती ,मगर उस छोटे कमरे की देहरी लांध सके , इसकी इजाज़त उसे जोगी से फिर भी न मिल सकी थी ।

बावली जोगी की ज़द में थी . उसे अकसर महसूस होता - जैसे जोगी नें उसे चितवन के टोटके से बंदिनी कर रखा है . मगर मौसम बदलने के साथ जोगी ने वही नज़र बावली से थोड़ी-थोड़ी तोड़ ली थी . ऐसे मायूस पलों में बावली तानपूरा लेकर गाने बैठ जाती. पर उसे लगता ...उसका एक भी स्वर सच्चा नहीं रहा .वह गाने का प्रयास करती तो उसे स्वयं की आवाज़ में रुलाई सुनाई पड़ती . वह घबराकर और एकाग्र होती, मगर दोबारा भी आवाज़ मानो किसी" पंजीरे खाए गले" से निकलती प्रतीत होती . आख़िरी बार" भैरवी" गाने बैठी बावली ने “रे,ग,ध ,नी, कोमल” के स्थान पर , शुद्ध लगाये . उसी क्षण वह जान गयी थी कि अब वह जीवन भर गा नही सकेगी . ह़र बार उसकी आवाज़ में जोगी के ऊपर किया गया भरोसा ,चूर हो -हो कर बिखरता रहता . फिर बावली ने एक दोपहर सदा के लिए तानपूरे पर कपड़ा मढ़ दिया ।


मौसम आते-चले जाते, जोगी के मन के धूप- छाँव पकड़ते - पकड़ते बावली के जीवन की साँझ होने आ गई । उसने ऐसा अनोखा प्रेम न कभी किया था, ना ही चखा था । वे कहते-“ मैने तुम्हे अपना लिया अब क्या सोच “? बावली ठगी सी उन्हे सुनती रहती और सोचती –“ अपनाने के लिये सामने वाले का समर्पित भाव क्या कोई मायने नहीं रखता “? बार - बार मन ही मन बुदबुदाती-“ मै कबूतर नहीं …मै कबूतर नहीं “


जोगी के प्रेम से बावली के अंतस में .... कामना और बैराग दोनो साथ- साथ उपजते । बावली दोनों के बीच सामंजस्य बैठाते-बैठाते दिन ब दिन बंजर होती जा रही थी । चाँद -सूरज को साक्षी रख , किसी रोज़ जोगी नें बावली से हश्र तक निबाह का वादा किया था। बावली उस "एक दिन"से कभी बाहर नहीं निकल पाई । कभी कभी उनकी विमुखता बावली को बहुत दूर उड़ जाने को आतुर करती , बावली भागती, मगर उसके आँचल का एक सिरा न जाने कहाँ अटक कर रह जाता ।

बावली याद करती -- किसी गोधुली में जोगी ने खिडकी से झांकते हुए नए चाँद को दिखाकर उससे कहा था –“मै चाँद माथे पर सजाना चाहताहूँ “.

बावली ने उनकी ओर मुस्कुरा कर देखा था और मन ही मन दोहराया था –“ चाँद पहनने के लिए आकाश होना पड़ता है “.

जोगी अपनी ज़िद से मजबूर थे .जो चीज़ उनकी शर्तों पर खरी न उतरती, वे उसकी तरफ पीठ कर लेते . पूनम की एक रात बावली ने देखा , जोगी ने, चाँद की आमद पर उस दिशा वाली खिड़की सदा के लिए बंद कर दी थी .

बावली जोगी के व्यवहार में धीरे-धीरे आए परिवर्तन को महसूस करती....

उस "छोटे कमरे" में जोगी के एकांतवास की अवधि बढ़ने के साथ, बावली के मन की धरा भी उसी अनुपात मे ऊसर होती जाती । वह अपने अरण्य में अकेले विचरती, कभी तितलियाँ पकड़ती तो कभी जुगुनू । उस जंगल में वो सारी बंदी बनाई गयी तितलियों के रंगीन पंख नोचती रहती ,अधखिली कलियों को मसल कर उन्हे दफ़न कर देती । बावली जानती थी, उसे इस जनम जोगी से निजात नहीं. जोगी चाहें तब भी नहीं ।

बावली के जीवन में, बाहर से आने वाले सभी तार जोगी नें तोड़ दिए थे .और स्वयं उससे बेखबर रहने लगे . ऐसे में बावली का दिल करता वह जोगी के ह्रदय में एक" बबूल का बीज" रोप दे ।

समय अपनी गति से बीतता रहा . जोगी कभी बावली की उपेक्षा करते…कभी उसे पहरों सामने बैठाये रहते . ऋतुएँ लौट-फेर आतीं, देखतीं बावली अब तक जोगी की आस में खोयी खोयी रहती है . इस दौरान वह सुनती , जोगी के गिर्द नए पंछियों का कलरव . बावली इसे अपनी आज़माइश समझ कर चुप रहती .

फिर चैत्र लौटा और बावली ने देखा कि जोगी के हाथ में कुछ नयी 'बावलियों' की रेखाएं उभर आयी हैं . उस दिन बावली उजड़ गयी .जहाँ जन्मी थी वहाँ लौट पाना उसके लिए संभव नहीं था . पिछले सभी सम्बन्ध वह जोगी के अनुनय -विनय पर पहले ही खारिज कर आयी थी . जोगी का दिया हुआ आकाश और जोगी की बख्शी ज़मीन पर ही बावली नें बरसों गुज़ार दिए थे . जोगी को छू कर आती हवाओं को उसने साँसों में बसा रखा था .जोगी के कहे हुए ढाई आंखर से बावली सदा के लिए उनकी हो चुकी थी . उसे विश्वास था जोगी पर.... ख़ुद से भी ज़्यादा .

बावली ने एक अंतिम प्रश्न किया जोगी से -"ये रेखाएं क्योंकर उभर आयीं तुम्हारी हथेली में"?

जोगी ने उत्तर दिया--" मै ऐसा ही हूँ,मुझे क्षमा कर दो ".

बावली मौन … पास से गुज़रते हुए बंजारों की टोली में शामिल हो गयी . उसे जोगी को देखने का साहस ना हुआ .जोगी नें उसका विश्वास छला था . बावली की आंखों में वे सारे चेहरे उभर आए, जिन्हें वह जोगी के कहने पर सदा के लिए अपने जीवन में बुझा आयी थी. बावली ने पैर में चक्कर बाँध लिए..उसे प्रेम में गुणा-भाग करना कभी रास नहीं आया ।

टुकुन दी बावली के चेहेरे पर उतर आयी पीड़ा की सांझ पहचानते हुए, सुनती रहीं …

बरसो बाद,वासंती बयारों ने प्रकृति की गोद ,फूलों से भर दी थी । कैक्टस के पौधे पर नन्हा गुलाबी फूल रह- रह कर झूम रहा था …बावली शहर-शहर घूमती हुई अपना आप भुला चुकी थी .

किसी गाँव के बाहर दो पल सुस्ताती बावली, ऊंघने लगी .अवचेतन में उसे कोई परिचित कराह खींचकर, एक सीलनभरे कमरे के दरवाज़े पर ला कर छोड़ गयी । ऊंची देहरी लांघ, बावली जहाँ आन खड़ी थी ,वह स्थान सदा से उसके लिये वर्जित था । बावली सिहर गयी ……

"जोगी कराह रहे थे ,बावली उनके रोम - रोम से बबूल का एक- एक काँटा चुन रही थी ".

भोर की बेला

शंख नाद से बावली सिसकते हुए जागी। दौड़कर ठाकुर के चरणों में उसने जोगी को दिया हुआ, एक-एक श्राप ख़ारिज किया ,और वहीँ शिवालय की गीली ज़मीन पर वह संज्ञाशून्य बैठ गयी ……

आश्रम में जगहर हुई.... टुकुन दी, कमरे से निःशब्द बरामदे में आ गयीं -कानों में बावली के अस्फुट स्वर गूँजते रहे -- "मेरी आवाज़ काठ की हो गयी है टुकुन दी ……मेरी आवाज़ काठ की"....



रविवार-जनसंदेश टाइम्स - कथालोक में मेरी प्रकाशित कहानी
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13 टिप्पणियाँ:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

कथा बहुत अच्छी है!
बधाई हो!
आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल मंगलवार के चर्चा मंच पर भी होगी!
सूचनार्थ!

Sanju said...

सार्थक प्रस्तुति है मैडम आपकी
मेरे ब्लॉग पर आपका स्वागत है।

डॉ0 ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ (Dr. Zakir Ali 'Rajnish') said...

शानदार कहानी। कल आपकी कहानी जनसंदेश टाइम्‍स में भी पढने को मिली थी।

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मुई दिल्‍ली की सर्दी..
... बुशरा अलवेरा की जुबानी।

प्रवीण पाण्डेय said...

रोचक कहानी

Roushan Mishra said...

dubaara padhna padega
achchhi kahani

Anita said...

अद्भुत !

रेखा said...

कहानी तो बहुत ही रोचक है ...

नीरज गोस्वामी said...

आप जिस विधा में भी कलम चलाती हैं....कमाल करती हैं...वाह

नीरज

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

भावनात्मक!

Madhavi Sharma Guleri said...

कहानी बांधने वाली है. मज़ा आया पढ़कर. बधाई.

Kishore Choudhary said...

जो चीज़ें उनकी शर्तों पर खरी न उतरती, वे उनकी तरफ पीठ कर लेते. पूनम की एक रात बावली ने देखा. जोगी ने चाँद की आमद पर उस दिशा वाली खिडकी सदा के लिए बंद कर दी थी.

सुन्दर और प्रवाहमय कहानी है पारुल... पढ़ कर बहुत देर तक चुप सा था. कितनी ही खूबसूरत कहानियों के छोटे छोटे हिस्से याद आये. वे सब इस कहानी से बेहद अलग थे मगर अपने तंतुओं को मेरी सूखी शाखाओं पर बाँधने लगे. अचानक देवदास का अंत भी याद आया... कि उसके जैसा हतभाग कौन होगा, जो एक बार मुंह देख भर लेने की इच्छा लिए उसी के द्वार पर तडपता हुआ मर जाये.

जोगी की हथेलियों में नई रेखाएं उग आती है और मन का पंछी उड़ उड़ कर नयी शाख पर बैठता है. शाखाएं अपने लोच को कभी कभी जानबूझ कर भूल जाती है और कोमल की जगह शुद्ध स्वर लगाने लगती हैं. ऐसे अनेक कहनी के सुन्दर कटाव हैं जो इसे अधिक रूपायित करते हैं.

मेरी बधाई.

Akhil said...

अनुपम...बहुत सुन्दर...कहानी मन के उस छोटे कमरे तक पहुँच गयी पारुल जी..

singhSDM said...

पारुल जी
आवाज़ काठ की हो गयी..... नया दृश्य प्रस्तुत करती है ये रचना..... पत्रों के मनोभावों के उतर चढाव को बयान करती प्रभावी रचना.