Wednesday, December 28, 2011

ख़बर है - आगे बस डूब ही डूब है ,जाग ही जाग


लौटते हुए इन गीतों तक,वहीदा तक

इस घड़ी सब ख़ाली है…ये लम्हा ख़ाली ,इसका क़तरा-क़तरा ख़ाली । ख़ाली कमरा, फ़र्श पर रखी कुर्सियां ख़ाली … कुछ भी दर्ज़ नहीं मेज़ पर रखे रजिस्टर में..एक शब्द नहीं... उसके फड़फड़ाते पन्ने तक ख़ाली....हवा में अकेली सीढ़ियों पर साड़ी का आँचल रजिस्टर के पन्नो की लय में काँपता हुआ - कोरा - ख़ाली ।
"पुकार लो" कहने वाला किसी और की धुन में… मै उसकी धुन में ...तार उलझ गये ...कोई किसी को पूरा नहीं पड़ता । मेरे मन की थाह तुम्हे नहीं मिलती ..तुम्हारे मन की किसी और को ..दो पल पहले का उछाह दो घड़ी बाद डूब गया...गहरे,बहुत गहरे सुन्दर कांच का झूमर झमक कर टूट गया..किर्च आंखों तक न जाने कैसे तैर आयी … उसे बाहर ना आने देना..पलकों की कोर पर खरक जाएगी…सीढ़ी चढ़ते हुए पता है… तुम, वहां ऊपर नहीं...किसी के इंतज़ार में हो..सीढ़ी उतरते हुए जाना तुम्हे हमेशा के लिए छोड़ आई हूँ । पीर, कही नही जाती...सही नहीं जाती...पर रोना नहीं..मुस्कराना है.
दिल चाहेगा रोना....सिसकियों से .. कुछ देर बाद...एकांत में…नीले आसमान के नीचे जहाँ हवा तक ठहरी हो..रोना बस रोना..देर तक...दूर तक,और फिर चुप ,सदियों की चुप ...एक तवील ख़ामोशी.....
विवशता समझ नहीं आती .. समझनी पड़ती है.....तकलीफ देह,रेशमी सूनापन घिर रहा है...चारो तरफ .... सहेजना मुश्किल …
ख़बर है कि आगे बस डूब ही डूब है ...जाग ही जाग…ख़बर है कि सारे मौसम पराये हैं..बुझ रहे हैं धीरे -धीरे , एक-एक कर सभी द्रश्य ।
सीने पर दबाये ...बहुत मज़बूती से पकडे कोई किताब ...आगे क्या?ख़ुद से सवाल है…
मेरे चेहरे पर तुम्हारी पीठ है ....हिलते हुए पर्दों के इस पार से उस पार सब धुंधला है कि जाने मेरी आँख ही धुंधली हो रही है . किसी रोज़ इसी के पीछे कैद हो रहूंगी..जिस जाली के दरवाज़े को उड़का रही हूँ अभी...उस पल...हसूंगी..चीखूंगी नहीं फिर भी ।
दिल का बहलाव नही था...लगाव था .हाल बताना था ...बता ना सकी .....रात बेक़रार थी ...रह गयी बेक़रार ही…बात तुम्हारे होठों की... मेरे होठों तक आ न सकी ......मुख़्तसर सी बात


तुम पुकार लो

रूखी आंखों से देख रही हूँ ये शाम ...ये उसी ख़ाली शाम की सूनी सहेली है ...तुम किसी को भूल रहे हो...मै किसी को याद करती हुई । इसमें तुम हो ,वो है...मै फिर भी नहीं । अजब नाता है दूर-पास का ... खोये हुए की तलाश का...पा जाने का ...पाने की कोशिश करने का । पानी का छींटा,उछल आया कि उछाला हुआ...आँख में भर आया । तुम्हे मेरा सहारा है ...मुझे किसका है ? सोचती हूँ ....
तुम्हे लगता है गुनगुना रही हूँ मै..
ये लोहे का पुल...ये नदी में सोयी मछलियाँ जानती हैं शायद .....मेरी पत्थर हो आयी हंसी का कौन सा रंग है । तुम्हारे दुखों पर मेरे आँचल की छाँव है...मुझ पर… ढलती शाम की ओढ़नी है ....अजीब है ये शाम भी ...



वो शाम कुछ अजीब थी

सफ़र में हूँ ...ख़ुद को भूली हुई ...भूलने की कोशिश करती हुई ....कि सारे ऊपरी तूफ़ान तो गुज़र गए ...निशान ख़ुश्क रह गए … चेहरे पर ,मन पर । अब थम के सुनती हूँ ...ये धुन । दिन पलाश के हवाले किये थे कभी..मना किया था छूना मत ..तुमने मसल डाले थे सारे के सारे । अहसास था ...मर गया..बिखर गया...रूह तक पहुंचा ही नहीं ...अब इस नज़ाकत का क्या करूँ ....कि हाथ कोई और छुअन जानते नहीं....देना नहीं था वो नाम ,जिसे जीवन भर पुकार ना सके ...बात सी बात न थी ,इलज़ाम सा इलज़ाम न था .....बसर हो सकता था रिश्ता… ख़ामोशी से ,ख़ामोशी में ....जो चाहते । मै वहीँ ठहर गयी ...उसी एक नूर की बूंद की प्यास में....तुम ,तुम चले गए ।
पलाश आज भी खिलते हैं ...उस रास्ते पर ...वे बुझे नहीं ... कुम्हला गए हैं ...

उन्होंने देखी थी कभी ...इन आँखो की महकती ख़ुशबू ....


हमनें देखी है उन आंखों की महकती ख़ुशबू