Saturday, December 24, 2011

कनेर की डाल पर


छेंक लूँगी
दबे पाँव,पंजों के बल
एक दिवस
कनेर की डाल पर फुदकती
इस नन्हीं फुलसुंघनी की
राह

फिर
कर दूँगी ताकीद
कि, दिन रैन इतना ना टेरे वो …

हथेलियों पर दाना परोसते
जताऊँगी कि
उसके अविराम गाने से
ये सांवले घन सदा छाए रहते हैं ,
लंगर डाल बैठे हैं वे
हमारे आकाश पर …

उसकी
व्याकुल पुकार का सिरा थाम
वे जब-तब ,बेहिजाब,बेहिसाब
बरस पड़ते हैं

मेघों के निरंतर रुदन से
नम हो चले हैं सभी अंतर्मन

इससे पहले कि एक सीली गंध
उतरे हमारी आत्मा की
भीतरी सीढियां ,
समा जाये हहराकर
प्राणों में

करूंगी बिनती… दुलराते हुए
कि टेरना बंद कर अब
विश्राम ले वो
और विदा करे बादलों को
दूर देस … बिदेस




चित्र-गूगल

16 टिप्पणियाँ:

प्रवीण पाण्डेय said...

बहुत सुन्दर कविता

रीनू तलवाड़ said...

bahut sundar :)

Anonymous said...

Wah!

Swaran Singh said...

Wah!

संतोष कुमार said...

वाह क्या बात है ! सुंदर रचना !

आभार !!

sushma 'आहुति' said...

सुंदर अभिव्यक्ति..

पुष्पेन्द्र वीर साहिल said...

बहुत सुन्दर !!

दीपशिखा वर्मा / DEEPSHIKHA VERMA said...

छेंक लूंगी :)

आपके शब्दों से एक रिश्ता-सा बन जाता है. बहुत सुन्दर.

Shah Nawaz said...

Behtreen!!!

Avinash Chandra said...

बहुत सुन्दर! मन को आनंदित करते बोल :)

यशवन्त माथुर (Yashwant Mathur) said...

कल 27/12/2011को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
धन्यवाद!

Dr.Nidhi Tandon said...

व्याकुल मन की पीड़ा

S.M.HABIB (Sanjay Mishra 'Habib') said...

बहुत सुन्दर कविता...
सादर बधाई...

vidya said...

बहुत सुन्दर..
बेहतरीन...

Sanju said...

अच्छी कविता..........

डॉ. नूतन डिमरी गैरोला- नीति said...

bahut Khoob...