छेंक लूँगी
दबे पाँव,पंजों के बल
एक दिवस
कनेर की डाल पर फुदकती
इस नन्हीं फुलसुंघनी की
राह
फिर
कर दूँगी ताकीद
कि, दिन रैन इतना ना टेरे वो …
हथेलियों पर दाना परोसते
जताऊँगी कि
उसके अविराम गाने से
ये सांवले घन सदा छाए रहते हैं ,
लंगर डाल बैठे हैं वे
हमारे आकाश पर …
उसकी
व्याकुल पुकार का सिरा थाम
वे जब-तब ,बेहिजाब,बेहिसाब
बरस पड़ते हैं
मेघों के निरंतर रुदन से
नम हो चले हैं सभी अंतर्मन
इससे पहले कि एक सीली गंध
उतरे हमारी आत्मा की
भीतरी सीढियां ,
समा जाये हहराकर
प्राणों में
करूंगी बिनती… दुलराते हुए
कि टेरना बंद कर अब
विश्राम ले वो
और विदा करे बादलों को
दूर देस … बिदेस
चित्र-गूगल
16 टिप्पणियाँ:
बहुत सुन्दर कविता
bahut sundar :)
Wah!
Wah!
वाह क्या बात है ! सुंदर रचना !
आभार !!
सुंदर अभिव्यक्ति..
बहुत सुन्दर !!
छेंक लूंगी :)
आपके शब्दों से एक रिश्ता-सा बन जाता है. बहुत सुन्दर.
Behtreen!!!
बहुत सुन्दर! मन को आनंदित करते बोल :)
कल 27/12/2011को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
धन्यवाद!
व्याकुल मन की पीड़ा
बहुत सुन्दर कविता...
सादर बधाई...
बहुत सुन्दर..
बेहतरीन...
अच्छी कविता..........
bahut Khoob...
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