Tuesday, November 29, 2011

राग-विराग की धूप-छांह



कार्तिक मास के बरामदे में सिमटती फीकी धूप जैसा,मद्धम सुर में करवट लेता,वापसी का सफ़र…कहीं से भी हो , आसान नहीं होता . छोड़ी गयीं जगहें, देखे हुए, मंज़र मुकम्मल तौर पर कभी नही छूटते .आधी खायी चॉकलेट,अधपी लिम्का की बोतल बेतरतीब लिखा कोई परचा ,मंदिरों की भभूत , शिप के टिकट के साथ-साथ बहुत कुछ लुक-छिप , मन के गलियारों में गुप-चुप बचा चला आता है .

हवाई यात्रा के दौरान महसूस होता है कि ये सर घूमने की प्रक्रिया, पहाड़ी रास्तों से हमारे साथ लिपटी चली आयी है . ट्रेन की बर्थ पर सोते हुए कानों में समंदर की पुकार लहर दर लहर गूँजती रहती है . दिनों तक ज़बां से खट्टी कैरी का स्वाद नहीं उतरता .गाहे-बगाहे …किसी पेंटिंग के रंगों में, नरियल के पेडों से गुज़रती शांत सांझ गुंथ जाती है । कार की सीट पर धुले कपड़ों की जेब से,जब चुटकी भर रेत झरती है तो अनायास उस घौरेंदे का ख़याल कौंधता है- जिसे लहर नें कोवलम के तट पर अपनी आग़ोश में ले लिया था ...और हम मूक देखते रह गए थे . ऐसे ही असंख्य लम्हे,दृश्य ,विचार जब-तब चमकने लगते हैं ।

अलमारी में पर्स सहेजते हुए , साथ चले आए रंगीन पत्थर बजते हैं, और याद के झरोखे से कोई पुरानी बात सरक आती है..कि आग्रह कर उसी तट से हमने किसी से उजले शंख और सीपी मंगवाए थे , वर्षों बाद उस अरब सागर के किनारे... टहलते हुए पाया कि वैसे शंख तो इस रेत में उपजते ही नहीं . अनमना मन पल भर कसक जाता है, कि फिर ड्राइंगरूम में टैराकोटा कछुए की पीठ पर, जिन शंखों को आज तक हमने सहेज रखा है आखिर वो शंख, कोई लाया कहाँ से था ?खरक जाता है याद का एक नम टुकड़ा पलक की कोर में,सामने दो बच्चे बैंगनी सीपियॉ इकट्ठे करते यकबयक हंस पड़ते हैं ...

सागर का गंभीर घोष चित्त पर सिमटता है,किनारे चलते हुए पैर थकते हैं ,पर मन के अश्व अविराम इन्ही तरंगो का स्पर्श पाना चाहते हैं . कमर तक पानी में बढ़ते हुए आती लहर का आलिंगन…लहर हमारी इच्छा का मान रखते हुए पूरा वजूद तर-बतर कर जाती है ,लेकिन गिरने नहीं देती । सागर के ह्रदय से उठती हिलोर, रेत का अंबार पैरों के नीचे झोंक देती है और वापस लौटे वक़्त वो उसे बहुत लिहाज से हौले-हौले खींचती है । उसका तलवों तले से सरकना महसूस होता है..क्षण भर को चेतना सिहर जाती है सोच कर कि जीवन में प्रेम का आवा गमन भी ठीक इसी तरह होता है ...पूरे वेग से आना ..छा जाना और फिर धीरे धीरे रीत जाना .. स्मृतियों के गलियारे में लाल-सफ़ेद धारियों में स्थिर, लाईट हाउस देखता है -सागर किनारे एक सौम्य दोपहर का अवसान

जालीदार नारियल के पत्तों से झांकते, केसरिया आकाश के आँचल से... पंछियों की पंक्तिबद्ध कतार, और सुरमई क्षितिज से साँझ , एक साथ नीली फेनिल लहरों और किनारे की चट्टानों पर आहिस्ता-आहिस्ता उतरती है .वहाँ हरी बेलों पर फ़ालसही फूल खिले हैं . एक वर्द्ध अंग्रेज़ महिला नितांत अकेली घुटनों तक समा जाती हैं उस अथाह गुनगुनी जलराशि में . पानी ख़ुद बढ़कर उनका माथा चूम लेता है .
हरिवंशराय बच्चन की पंक्तियाँ स्मरण होती हैं -- "लहर सागर का नहीं श्रृंगार ,उसकी विकलता है"

सागर का दूसरा छोर गहराने लगता है , मानों फुकनी से कोई साँझ का चूल्हा सुलगा रहा है .होंठ बुदबुदाते हैं- "ये गंध भरी शाम कहीं तुम तो नहीं हो ,संध्या शकुंतलाम कहीं तुम तो नहीं हो" ...

ऊपर रिसार्ट का एक कोना गुलज़ार होता है । वहाँ बांस से घिरे बरामदे में का्ठ की हरे -लाल चेहरे वाली कथक कलियों के मुखौटे हैं । उनकी मौन उपस्थिति में कुछ मलयाली स्त्रियाँ ताजा पकड़ी बड़ी मछली , सैलानियों के लिए कोयले की मद्धम आंच में भून रही हैं
.
जीवन अपने ढर्रे पर डग-मग चलते हुए, कई दफ़ा पलटकर रिसार्ट की लाल सीढियां उतरता है और थककर वापस काटेज के सामने, बेंत की कुर्सियों पर अधलेटा ...देर रात तक अमावस की रात में , लाईट हाउस और दूर गुज़रते पानी के जहाजों की हल्की रोशनी के सहारे अरब सागर पर गिरती बारिश देखता है....सागर की नाभि से उठते आरोह,अवरोह में मन्त्र मुग्ध बहुत दूर दिलेर मछुआरों की नावें निहारता है, वे दिये की झालर सी दीख पड़ती हैं । चौकीदार नीचे का गेट बंद करता है ,उसे ज्ञात है कि इस पहर लहरे बेपरवाह बढ़ती हैं और उनके सुन्दर नृत्य को रेत के निर्जन आँचल की दरकार रहती है


भोर, बायीं ओर ताड़ वृक्षों के झुरमुट से झलकने वाली ,पीली मस्जिद के बुर्ज़ में जाने अज़ान हुई थी कि नहीं.. मगर रात पानियों में उतरीं मछुआरों की रंगीन डोंगियाँ धुंधलके में ही किनारे लगने लगीं थीं ....वे सागर में डाले हुए जाल का एक सिरा नाव के सहारे तट तक ले आए थे और अब मशक्कत से रेत में उतरकर, मछली से भरे उस जाल को खींचते हुए लय में सुरीले उतार-चढ़ाव के साथ , कोई गीत गा रहे थे .....एक तरफ उमड़ती लहरों में मछलियों का ज़ोर दूसरी तरफ मछुआरों की ताक़त,एक तरफ जीने की चाह दूसरी तरफ जीविका की ...चाय का प्याला हाथ में लिए मै वो रस्साकसी देखती रही न जाने कितनी देर... पास के पेड़ से एक चील के उड़ते ही कुछ नारियल नीचे गिरे ...ध्यान बंटता है ...देखती हूँ
उजाला फैल चुका है . आसमान में सूर्योदय की हलकी रेख उभर कर छिप रही है ,एक विदेशी सैलानी जोडा तन्मय हो योग का अभ्यास कर रहा है ..राग-विराग की धूप-छांह के बीच बादल उमड़ आए ...कोवलम में दिन , फिर बौछारों और फुहारों में बीतने वाला था ....बडी चट्टान के पास एक छोटी नौका आकर लंगर डालती है उसके मछुआरे उदास हैं …मै सीढ़ी चढते हुए बुद्धिनाथ जी की पंक्तियां दोहराती हूं मन ही मन -

"एक बार और जाल डाल रे मछेरे , जाने किस मछली में बंधन की चाह हो" ……





(27 नवंबर को जनसंदेश टाइम्स में प्रकाशित--मेरी स्मृतियों के गलियारे-एक दिन लाईट हाउस बीच -कोवलम से)

12 टिप्पणियाँ:

प्रवीण पाण्डेय said...

आपके माध्यम से लगता है कि सारी प्रकृति बोल उठी है, प्रकृति के अनकहे अध्याय ऐसे ही व्यक्त करते रहें।

Udan Tashtari said...

बहुत ही उम्दा....

प्रज्ञा पांडेय said...

phoolon ko rangon ko aur sugandh ko aaapne sabdhon men baandh diya hai......

sushma 'आहुति' said...

behreen aur hi khubsurat post....

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

आपकी किसी नयी -पुरानी पोस्ट की हल चल आज 01-12 - 2011 को यहाँ भी है

...नयी पुरानी हलचल में आज .उड़ मेरे संग कल्पनाओं के दायरे में

महेन्द्र श्रीवास्तव said...

खूबसूरत प्रस्तुति
बहुत बढिया

संतोष कुमार said...

Sunder parstuti accha laga padhkar...

अनुपमा पाठक said...

सुन्दर!

Kailash C Sharma said...

बहुत भावपूर्ण और काव्यात्मक आलेख..बहुत सुंदर..

रंजना said...

यह गद्य है या नज्म...

क्या खूब पिरोया है तुमने मुग्धकारी दृश्यों को शब्दों में...

लाजवाब !!!!

singhSDM said...

आदरणीया
सागर के एहसासों से सराबोर ये रचना प्रकृति के साथ सम्बन्ध जोड़ने को विवश करती है.
दिल को छू जाने वाली कविता/ नज़्म/ पद्य (जो भी इसे समझा जाये....)
बहुत सुन्दर

दीपशिखा वर्मा / DEEPSHIKHA VERMA said...

आपको पढ़ते हुए खुशी से काँप जाती हूँ!