Wednesday, November 9, 2011

मिट्टी का मोर



कार्तिक शुक्ल चतुर्दशी
की रात
मनहर मयंक की
छांह..
हरी दूब पर बैठा
युगों से
उदास , ओस नहाया मिट्टी का
मोर,
पुलक मन चूम लेता है
अधखिला गंधराज का
फूल..
मदमाती ,
शीतल बयार संग
सम तक तिरती स्वरलहरी
राग चंद्र्कौंस की
बहक-बहक
जाती है ..





चित्र-गूगल साभार

9 टिप्पणियाँ:

अनुपमा पाठक said...

मिट्टी का मोर..
सुन्दर!

रीनू तलवाड़ said...

:-)

प्रवीण पाण्डेय said...

अनुपम वर्णन।

नीरज गोस्वामी said...

ADBHUT CHITR AUR UTNE HI ADBHUT SHABD...WAAH

Brijendra Singh... (बिरजू, برجو) said...

अलौकिक सामयिक छटा का सुंदर चित्रण.. :)

अनामिका की सदायें ...... said...

sunder chitran.

Kishore Choudhary said...

बहुत सुन्दर.

रंजना said...

WWWAAAAHHHHH.....

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

सुंदर! मिट्टी का न होता तो उड़ ही जाता शायद!