
इसके पहले
कि खुश्क़ हो जाये ये दिन
और ख़ामोश , दुबक कर सो जाए
रात की मसहरी में …
गुज़रना चाहती हूँ तुम्हारी जर्जर आवाज़ के गलियारे से
एक बार फिर …
वहां ,
उसकी गूँज के अंतिम छोर पर
टंगा होगा अब भी
इक बड़ा, पुराना आला
जहां थक कर बैठ जाते थे हवा में पैर झुलाए
हम दो
चाहती हूँ सराबोर करना
दुपट्टे की कोर
तुम्हारी कासनी मुस्कुराहट के छींटो से,
टूटते जुमलों में पिरोना
ज़िद की लड़ियाँ…
स्मृतियों में ही सही
जिलाना चाहती हूँ अपने अंतस की
नन्ही बच्ची
जिसे चाव था धुँध का ,धनक का,
उजली सीपियों का …
जो लहरों की लय पर छेड़ती थी
ऊँघती सारंगी की देह में
मल्हार…
जिसकी फुहारों में भीगता था
तुम्हारे काठ का अभिमान …
इसके पहले
कि दिन झपकने लगे अपनी अलस पलकें …
एक बार फिर
गुज़रना चाहती हूँ
तुम्हारी अधूरी आवाज़ के गलियारे से
बस एक बार …
चित्र-गूगल
8 टिप्पणियाँ:
हर गुजरते वर्ष के साथ यह मौसम एक वर्ष और कम हो जायेगा जीवन में।
waah sunder rachna kalpana se bharpur !
जिसकी फुहारों में भीगता था
तुम्हारे काठ का अभिमान
इसके पहले
कि दिन झपकाने लगे
अपनी आलस पलकें
एक बार फिर
गुरना चाहती हूँ
तुम्हारी अधूरी आवाज़ के गलियारों से
वाह !!! बहुत खूब लिखा है आपने भावपूर्ण रचना शुभकामनायें ....समय मिले कभी तो आयेगा मेरी पोस्ट पर आपका स्वागत है http://mhare-anubhav.blogspot.com/.
वाह..भावों की सुंदर अभिव्यक्ति..शुभकामनाये!!
सुनहरी यादों के ताने बाने से बुनी एक प्यारी सी कविता...
वाह जी बढ़िया.
बेहतरीन भावाभिवय्क्ति.....
सुन्दर अभिव्यक्ति!
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