Monday, November 28, 2011

मौसम 28 नवंबर


इसके पहले
कि खुश्क़ हो जाये ये दिन
और ख़ामोश , दुबक कर सो जाए
रात की मसहरी में …

गुज़रना चाहती हूँ तुम्हारी जर्जर आवाज़ के गलियारे से
एक बार फिर …

वहां ,
उसकी गूँज के अंतिम छोर पर
टंगा होगा अब भी
इक बड़ा, पुराना आला
जहां थक कर बैठ जाते थे हवा में पैर झुलाए
हम दो

चाहती हूँ सराबोर करना
दुपट्टे की कोर
तुम्हारी कासनी मुस्कुराहट के छींटो से,
टूटते जुमलों में पिरोना
ज़िद की लड़ियाँ…

स्मृतियों में ही सही
जिलाना चाहती हूँ अपने अंतस की
नन्ही बच्ची
जिसे चाव था धुँध का ,धनक का,
उजली सीपियों का …

जो लहरों की लय पर छेड़ती थी
ऊँघती सारंगी की देह में
मल्हार…

जिसकी फुहारों में भीगता था
तुम्हारे काठ का अभिमान …

इसके पहले
कि दिन झपकने लगे अपनी अलस पलकें …

एक बार फिर
गुज़रना चाहती हूँ
तुम्हारी अधूरी आवाज़ के गलियारे से

बस एक बार …



चित्र-गूगल

8 टिप्पणियाँ:

प्रवीण पाण्डेय said...

हर गुजरते वर्ष के साथ यह मौसम एक वर्ष और कम हो जायेगा जीवन में।

संतोष कुमार said...

waah sunder rachna kalpana se bharpur !

Pallavi said...

जिसकी फुहारों में भीगता था
तुम्हारे काठ का अभिमान
इसके पहले
कि दिन झपकाने लगे
अपनी आलस पलकें
एक बार फिर
गुरना चाहती हूँ
तुम्हारी अधूरी आवाज़ के गलियारों से
वाह !!! बहुत खूब लिखा है आपने भावपूर्ण रचना शुभकामनायें ....समय मिले कभी तो आयेगा मेरी पोस्ट पर आपका स्वागत है http://mhare-anubhav.blogspot.com/.

Brijendra Singh... (बिरजू, برجو) said...

वाह..भावों की सुंदर अभिव्यक्ति..शुभकामनाये!!

Anita said...

सुनहरी यादों के ताने बाने से बुनी एक प्यारी सी कविता...

काजल कुमार Kajal Kumar said...

वाह जी बढ़िया.

sushma 'आहुति' said...

बेहतरीन भावाभिवय्क्ति.....

अनुपमा पाठक said...

सुन्दर अभिव्यक्ति!