Friday, October 14, 2011

शामें



दुःख चले हैं कान मेरे पंछियों के शोर से
शाख़े-गुल झुक कर इन्हें तुम अब बसेरा दे ही दो





चित्र-गूगल साभार

9 टिप्पणियाँ:

प्रवीण पाण्डेय said...

बहुत ही अच्छा।

Arvind Mishra said...

अरे:)
पंछियों की रणनीति आखिर कामयाब हो गयी :)

दिनेश पारीक said...

बहुत बढ़िया लिखा है आपने! और शानदार प्रस्तुती!
मैं आपके ब्लॉग पे देरी से आने की वजह से माफ़ी चाहूँगा मैं वैष्णोदेवी और सालासर हनुमान के दर्शन को गया हुआ था और आप से मैं आशा करता हु की आप मेरे ब्लॉग पे आके मुझे आपने विचारो से अवगत करवाएंगे और मेरे ब्लॉग के मेम्बर बनकर मुझे अनुग्रहित करे
आपको एवं आपके परिवार को क्रवाचोथ की हार्दिक शुभकामनायें!
http://kuchtumkahokuchmekahu.blogspot.com/

Anita said...

वाह ! सुभानल्लाह!

ana said...

kya baat kahi hai....wah bhai wah

sushma 'आहुति' said...

bhaut hi sundar...

पुष्पेन्द्र वीर साहिल said...

achcha observation..

Udan Tashtari said...

सुन्दर!!

नीरज गोस्वामी said...

चित्र और शेर...दोनों अद्वितीय...आप कमाल करती हैं.

नीरज