
अरसे तक आबिदा को सुनना टलता रहा
इधर,उनकी आवाज़ सुनते ही हौल आता था
उनकी सच्ची पुकार की पगडण्डी चढ़ते हुए
सालों-साल मन का कोरा घट
बूंद-बूंद भरोसे से भरा था,
उनकी आवाज़ के साए तले
कोई रिश्ता बना था
वे पाक़ीज़ा दिन ,दोपहरे, शामें
जब बुझीं
तो ये आवाज़ भी मेरे गिर्द ख़ामोश हो रही
सन्नाटों के शामियानों में कई राग करवट लेते
पर आबिदा… रुठी की रुठी रहीं .
मानों करीब से उठ कर जाने वाले
रुख्सती में
मेरे सुनने का शऊर भी समेट ले गए
लम्बी यात्राओं के दौरान कान ख़ुश्क ही रहे
ट्रेन की सीटी गूँजती,
स्टेशन दर स्टेशन उतरना-चढ़ना जारी रहा…
बिना किसी धुन ,बिना किसी संगीत के सहारे
पुरानी इमारतों,मीनारों बीच मन डोलता
मेहराबों में कीमती सदाएं फ़ानूसों की तरह झूमीं
मगर आबिदा ....
आबिदा लाख कोशिशों पर भी
कहीं नहीं झलकीं
कल रात
फिर न जाने किस घड़ी
मालती और हरसिंगार की
मिली जुली बावली गंध से बिंधा
शरद पूर्णिमा का चाँद
उजली हवा के पाल से... कोमल,ख़ामोश आहटों में
अजाने .. छत की लाल मुंडेर पर आ टिका
आँगन में रखी खीर उसने
आंखों ही आंखों चखी
और मौसम एक खुनक के साथ ख़ुशरंग हो गया
दिन लौटे,
साथ सुनने का मिज़ाज भी लौटा …
मै होश में हूँ तो तेरा हूँ, दीवाना हूँ तो तेरा हूँ,
हूँ राज़ अगर तो तेरा हूँ, अफ़साना हूँ तो तेरा हूँ
स्वर-आबिदा परवीन
रचना-हज़रत ज़हीन शाह
8 टिप्पणियाँ:
"अरसे से आबिदा को सुनना टलता रहा"...ये तो गैर मामूली बात हो गयी...मेरा सूरज तो बिना उन्हें सुने मेरे बालकोनी की मुंडेर तक आता ही नहीं...उन्हें सुनना इश्वर की इबादत करने जैसा है...हमेशा अच्छा लगता है...अभी भी लग रहा है...
नीरज
अहा..
Thanks for this present..
bahut khoob
poore chand ki chandni kya khoob failayee hai aapne....shukriya.
बहुत ही खूबसूरत,आभार.
आपकी बात
बात फूलों की :)
आबिदा को सुनना हमेशा ही अभिभूत करता है...
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