
परात भर धूप ...
पंछी जा बैठा
ऊँचे-बुजुर्ग पेड़ पर
चुगते हुए उसका…
चोंच भर
सुनहरा टुकड़ा
तितलियों ने धारण किया
रंगीले-गीले पंखों पर
उसका
एक नन्हा अंश
बालकों ने,
मुट्ठी भर छिपा ली
कमीज़ की जेबों में
रोटी के बगल,
अखबार में
काम वाली बाई ने
समेट लिया, छटांक भर
रिसता उजास …
गज़ भर लम्बी धामिन भी
सामर्थ्य भर
गिरह कर ले गई
लचकदार पूँछ में
अंत का उपेक्षित
चुटकी भर चकत्ता...
पोरों से उठा… मैंने
आँज लिया अपनी
पिराई आंखों में
और आँगन बीच …
देखते ही देखते
बँट गई आपस में
एक पाख बाद उगी
परात भर धूप …
पिराई-दुखती
परात-थाल
चित्र-गूगल
16 टिप्पणियाँ:
परात को मिली, परात भर धूप।
बहुत सुन्दर भाव... परात भर धूप ने उजास फैला दी
सुन्दर....
बनी रहे
बची रहे
धूप और उजास।
कभी रीते ना
बीते ना
उम्मीद और आस।
अद्भुत..अद्भुत.. परात भर धूप..!!
आपके फितूर निराले होते हैं. नए लीपे मिट्टी के घर से जो महक आती है, आपकी कविता में समा जाती है.
मन मोह लेती है ये कविता।
कितना उजास है इसमें।
बेह्द गहरे भाव्।
वाह,बहुत सुंदर.
गजब की कल्पना!
घुघूतीबासूती
वाह ! सुंदर शब्द चित्रों से सजी प्यारी सी कविता पढकर गांव की याद आ गयी...
एक बार फिर आपके शब्द कौशल ने मन्त्र मुग्ध कर दिया...नमन है आपकी लेखनी को...अद्भुत
नीरज
वाह....क्या चित्र खींचा तुमने...
अद्वितीय...
बिम्ब प्रयोग अद्भुद है....
अनूठी शब्दावली
अद्भुत अलंकरण
अनुपम काव्य ...
अभिवादन .
शक्ति-स्वरूपा माँ आपमें स्वयं अवस्थित हों .शुभकामनाएं.
वाह..वो चुटकी भर चकता!
क्या कहने.
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