
अंतहीन
दोपहर के
नम और ऊंघे
छोर पर...
गुलाबी चोंच,
जर्द लिबास वाली
गोल्डेन ओरियल की
प्रतीक्षा में
अपलक,सड़क पार...
निहारते हुए,
उमसाए
जंगलनुमा झुरमुट
में...
कोरी
आंखों से...
बच्चों की दूरबीन
से...
या कैमरे की निगाह
से भी
कभी-कभी...
नज़र
मुझे आते हैं
सिर्फ ,कौव्वे ...
ख़ुदाया…
गोल्डेन ओरियल नामक चिड़िया को पीलक भी कहते हैं
चित्र-गूगल साभार
11 टिप्पणियाँ:
प्रतीक्षा की ऊब और उसके के जारी रहने का उद्घोष करती हुई, सुंदर कविता.
सुनो पारुल, एक गाने की लाइन है बाजरे के खेतो में कव्वे उड़ायेंगे...जरा याद दिलाओ मुखड़ा उखड़ा कुछ...
nazar aate hain sirf kauve.... !kuch bhi saras sahaj saral nazar nahin aata
न कितना कुछ और दिखाती कविता।
प्रतीक्षा ... !
खूबसूरत कविता ..
थोड़ी सी जमीं थोड़ा आसमां...यही न..?
तिनकों का इक आशियाँ...वाह...मिल गया.
कव्वे...गोल्डन ओरियल की अपेक्षा अधिक जो हैं...उनके नज़र आने की सम्भावना भी इसीलिए अधिक है...नहीं?
नीरज
This poem underlines the irony of the society.....good people like golden oriel are pushed to the background while lumpen elements like crows take centrestage
Nice weaving of thoughts.
Your writing is thought provoking
khoobsurat kavita.
ओह, नंगा सच। जैसे आइना को कविता की शक्ल में सामने ला कर रख दिया हो। आभार। आपकी संवेदनशील भावनाओं को सलाम।
waah...ek arse baad kuch aisa padha jo man tak pahuncha..bahut bahut sundar kriti.
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