इक ज़रा खेल,
इक ज़रा शौक़
चंद आवाजें...
कुछ एक क़िस्से
आँख भर चाँद ,
बांह भर आस्मां
तेज़ रूख़ धूप
तुनक हवाएँ ...
अनगढ़ अदाएगी
क़तला-क़तला
अफ़सानें ..
हिज्र की बातें
वस्ल की रातें
तुक मिली
गुज़ारिश
उदास आहटें..
लरज़ती तनहाई
बेतुकी रफ़ाक़तें,
तमाम मौसम
तमाम.. जगराते...
बेलौस नादानी
बेफ़िक्र मुस्कुराहटें
होश भी,
बेख़बरी भी...
न पूछ
क्या-क्या, और क्योंकर
ये सब दर्ज़ है
यहाँ..
ज़िक्र,
बस इतना
कि इस ठाँव की उम्र
चार बरस हो आई .
17 टिप्पणियाँ:
बूँद बूँद कविता लिखी आपने... ओक भर पढ़ी हमने....
खूबसूरत !!
बहोत खूब.. अभिनन्दन..
गज़ब की अभिव्यक्ति।
वाह,भावों और शब्दों में उलझ गये हम,आभार.
बधाई हो!
Ab yahin 40 bhi karen ! Mubarak.. damdaar 4 saal.
सच में बहुत ही सुन्दर शब्द और उतने ही खुबसूरत भावो को एक साथ रचना में उतरा आपने...
I just added this blog to my google reader, great stuff. Can't get enough!
साल दर साल ये खूबसूरत कारवां यूँ ही चलता रहे...आमीन
नीरज
bhavo ka kafila hi tha... sundar sa.
HI, I just joined this community. I m from China. I like this forum.......hope to learn lot of things here ;-)
खूबसूरत. बहुत.
यूँ न करो तुम हिज्र की बातें
यूँ न करो एक बेतुकी गुज़ारिश
इक उदासी मुझमें भी है
इक नादानी अभी है कहीं बाकी
ज़िक्र क्यूँ करती हो
उन चार बरसों का
जिसका न अब कोई ठौर है
और न कोई माज़ी है बाकी .......
मैं आ गया हूँ जानां
क्या ये काफी नहीं ....... ?
Gunjan
आज पहली बार आपको पढ़ा....पढ़ कर अच्छा लगा
अच्छा लिखती हैं आप ...... गुंजन
shukriya
Anurag ji
Neeraj ji
Sagar ji :)
shukriya Mitron
उदास आहटें
लरजती तनहाई
बेतुकी रफ़ाकतें
बेलौस नादानी
अच्छा प्रयोग है
सादर
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