Tuesday, August 16, 2011

चार बरस..होश भी..बेख़बरी भी...


इक ज़रा खेल,
इक ज़रा शौक़
चंद आवाजें...
कुछ एक क़िस्से
आँख भर चाँद ,
बांह भर आस्मां
तेज़ रूख़ धूप
तुनक हवाएँ ...
अनगढ़ अदाएगी
क़तला-क़तला
अफ़सानें ..
हिज्र की बातें
वस्ल की रातें
तुक मिली
गुज़ारिश
उदास आहटें..
लरज़ती तनहाई
बेतुकी रफ़ाक़तें,
तमाम मौसम
तमाम.. जगराते...
बेलौस नादानी
बेफ़िक्र मुस्कुराहटें
होश भी,
बेख़बरी भी...
न पूछ
क्या-क्या, और क्योंकर
ये सब दर्ज़ है
यहाँ..

ज़िक्र,
बस इतना

कि इस ठाँव की उम्र
चार बरस हो आई
.







17 टिप्पणियाँ:

पुष्पेन्द्र वीर साहिल said...

बूँद बूँद कविता लिखी आपने... ओक भर पढ़ी हमने....
खूबसूरत !!

yog said...

बहोत खूब.. अभिनन्दन..

प्रवीण पाण्डेय said...

गज़ब की अभिव्यक्ति।

डॉ. मनोज मिश्र said...

वाह,भावों और शब्दों में उलझ गये हम,आभार.

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

बधाई हो!

सागर said...

Ab yahin 40 bhi karen ! Mubarak.. damdaar 4 saal.

sushma 'आहुति' said...

सच में बहुत ही सुन्दर शब्द और उतने ही खुबसूरत भावो को एक साथ रचना में उतरा आपने...

Anonymous said...

I just added this blog to my google reader, great stuff. Can't get enough!

नीरज गोस्वामी said...

साल दर साल ये खूबसूरत कारवां यूँ ही चलता रहे...आमीन

नीरज

leena malhotra rao said...

bhavo ka kafila hi tha... sundar sa.

Anonymous said...

HI, I just joined this community. I m from China. I like this forum.......hope to learn lot of things here ;-)

mepretentious said...

खूबसूरत. बहुत.

Gunjan Agrawal (Goyal) said...

यूँ न करो तुम हिज्र की बातें
यूँ न करो एक बेतुकी गुज़ारिश
इक उदासी मुझमें भी है
इक नादानी अभी है कहीं बाकी
ज़िक्र क्यूँ करती हो
उन चार बरसों का
जिसका न अब कोई ठौर है
और न कोई माज़ी है बाकी .......

मैं आ गया हूँ जानां
क्या ये काफी नहीं ....... ?

Gunjan

Gunjan Agrawal (Goyal) said...

आज पहली बार आपको पढ़ा....पढ़ कर अच्छा लगा
अच्छा लिखती हैं आप ...... गुंजन

पारुल "पुखराज" said...

shukriya
Anurag ji
Neeraj ji
Sagar ji :)

पारुल "पुखराज" said...

shukriya Mitron

अमिताभ त्रिपाठी ’ अमित’ said...

उदास आहटें
लरजती तनहाई
बेतुकी रफ़ाकतें
बेलौस नादानी

अच्छा प्रयोग है
सादर