Thursday, August 4, 2011

समय बेतरतीब




इस समय
जबकि..
होम में झुलसी उँगलियों
पर
ठंडी फुहारे हैं,

समूचा सावन
बेतरतीब
उतर रहा है / देह के पोर-पोर

इस समय
जबकि
जीवन पद्य से अधिक गद्य
हो चला है
उबाऊ हो रही हैं
कृष्ण के महारास की कथायें,
राधा मंद-मंद मुस्काती,
निरखती है
गोपियों संग
नटवर की परछाईं


भक्ति..
व्यभिचारिणी हो
जगह-जगह
खन रही है
कूप,

समय बिताने के लिए
करना है कुछ काम की तर्ज़ पर
आये दिन मित्रताएं
दर्ज़ हो रही हैं …
एक ही इंसान
कईयों का ख़ुदा बना बैठा है
भ्रम टूटे ,
साथ छूटे हैं

बीते वर्षों के कुहासे से
आँख डबडबायी हैं

इस समय
जबकि
अंतस की रुदालियाँ छिप-छिप
कर रोती हैं
हलक का स्वर
चिपक कर रह गया है
तालू में!

एक बच्चे की आँख
बरबस हंसा जाती है
जो ..
कंठस्थ पाठ की पहली पंक्ति भूल
मेरे चेहरे
और
होठों को
झपक-झपक पलकों से तकता है / ये दोहराता हुआ कि आप बताइयेगा नहीं
मुझे सब याद है!




चित्र-गूगल

17 टिप्पणियाँ:

नीरज गोस्वामी said...

मन्त्र मुग्ध करती इस रचना के लिए उपयुक्त प्रशंशा के शब्द कहाँ से लाऊं? कमाल किया है आपने.

नीरज

वन्दना said...

सुन्दर्।

रश्मि प्रभा... said...

behtareen rachna

पुष्पेन्द्र वीर साहिल said...

aap bataiyega nahin... mujhe sab yad hai....

पुष्पेन्द्र वीर साहिल said...

bahut sundar rachna... shukriya...!!!

प्रवीण पाण्डेय said...

अद्भुत शब्द-विन्यास, सृजनात्मकता को प्रणाम।

सागर said...

अपने ही को चैलेंज करती रहती हैं ! अच्छा है. ! मजबूर हुए कुछ कहने को.

डॉ. मनोज मिश्र said...

जीवन गद्य से पद्य हो चला है......
अद्भुत, आभार.

अनामिका की सदायें ...... said...

sunder rachna.

दीपशिखा वर्मा / DEEPSHIKHA VERMA said...

आज-कल, छोटे-बड़े सब याद आ जाते हैं. मुस्कुराने को मजबूर करतीं पंक्तियाँ, बढ़िया!

Archana said...

बच्चे की आँख .....और कई प्रश्न -उत्तर साथ ही ....एक ही समय ....

AVADH said...

बहुत खूब!
पद्य से गद्य हो गए जीवन में एक 'नन्हे शिव' के मासूमियत भरे अंदाज़ द्वारा रस का संचार, क्या बात है.
अवध लाल

रीनू तलवाड़ said...

bahut sundar...man hara ho gaya :)

Vijay Kumar Sappatti said...

मेरे पास शब्द नहीं है , आपकी इस कविता की तारीफ के लिये ... बहुत सुन्दर रचना .. प्रेम रस में भीगी हुई ...

बधाई दिल से ...

आभार
विजय

कृपया मेरी नयी कविता " फूल, चाय और बारिश " को पढकर अपनी बहुमूल्य राय दिजियेंगा . लिंक है : http://poemsofvijay.blogspot.com/2011/07/blog-post_22.html

Anita said...

बहुत सुंदर कविता पढते पढते मन कहाँ खो गया पता ही नहीं चला...

Mired Mirage said...

पारुल यह कविता तो कुछ अलग ही रची है। न जाने किस मूड, किन विचारों में खोकर। बहुत पसन्द आई।
घुघूती बासूती

mepretentious said...

कितना सुंदर लिखती हैं आप, कितना सुंदर.
बस पढ़ कर आँखें डब-डबा जाती हैं, एक शांत मुस्कान के साथ.
जादू है आपके शब्दों में.
जितना सुंदर सोचती हैं, उतना ही सुंदर लिख भी देती हैं.
वन्दनीय और प्रेरणा हैं हमारे लिए.

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