Monday, August 1, 2011

झूला किन्ने डाला री-गुलाम मुस्तफ़ा खान



दिन,
पग फेरते
त्योहार,
साल दर साल
लौटते…

आज तीज
फिर नागपंचमी

हम
वहां नहीं,
जहाँ थे कभी…
पते
बदल गये
देहरियां पराई हुईं

जिस देस
बंजारों सा ठिकाना
अब …

उस ठौर,
"गुड़िया" नहीं मनती
पतंगे नहीं उड़तीं…
भाइयों की चुहल ,
पेंच देखते हुए
वो काटा का शोर
सुने
अरसा बीत गया

झूले हैं
पर उन्हे पेंग देने वाली
सखियाँ
हिरा गईं

घुघनी ,
गेहूं के उबले दानों की
नरमी,
घेवर की मिठास…
माँ के हाथों,
परोसे जाने का स्वाद
स्मृतियों के निवालों में
घुला-घुला
रह गया …

मेंहदी
लगाते…
बहनें याद आतीं,
घर
याद आता …


गुड़िया-कानपुर के आस-पास नागपंचमी को मनाया जाने वाला त्योहार




झूला किन्ने डाला री अमरइयां
स्वर-गुलाम मुस्तफ़ा खान
फ़िल्म-उमरावजान



अब के बरस भेज भईया को बाबुल
स्वर-आशा
फ़िल्म-बंदिनी

एक पुरानी पोस्ट झूला किन्ने डाला री/तीज/शाहिदा ख़ान

10 टिप्पणियाँ:

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

तीज की हार्दिक शुभकामनायें .. मीठा मीठा स स्वाद देती अच्छी रचना ..बहुत कुछ वक्त के साथ बदल जाता है या बहुत कुछ छुट जाता है ..

Sunil Kumar said...

यह सब बदलते समय का असर है अच्छी रचना , बधाई

वन्दना said...

तीज की हार्दिक शुभकामनायें .

sushma 'आहुति' said...

तीज की शुभकामनाये...

प्रवीण पाण्डेय said...

पता नहीं कि वह अपनत्व अब मिलेगा कि नहीं?

डॉ. मनोज मिश्र said...

बहुत संगीतमय ,सुंदर पोस्ट,आभार.

मनोज कुमार said...

बहुत-बहुत बधाई।
शुभकामनाएं।
रचना अच्छी लगी।

AVADH said...

धन्यवाद पारुलजी,
आपने समां बाँध दिया.
पिछले दो दिनों से मैं गुनगुना रहा था आशा जी का गीत और साथ में आपने उस्ताद गुलाम मुस्तफ़ा खां साहेब का झूला भी सुना दिया.
मैं आपकी पिछली पोस्ट भी देखने का लोभ न संवरण कर सका. शाहिदा खां ने भी क्या निभाया है. बहुत खूब.
आभार सहित,
अवध लाल

नीरज गोस्वामी said...

भाव विभोर कर दिया आपने...वाह...अमृत सा घुल गया है कानों में...

नीरज

singhSDM said...

पारुल जी
समय के साथ सब कुछ बदल गया न वो झूले रहे न वो पींगे देने वाले साथी-सहेली.....!!!
वक्त ने क्या क्या सितम ध दिए तीज त्योहारों को ख़त्म सा कर दिया...बहुत ही भावुक पोस्ट है ये....