Thursday, July 28, 2011

सावन-भादों साठ ही दिन हैं/फ़र्ज़ करो /इब्ने इंशा


अपनी धुन में पढ़ते-सुनते... इब्ने इंशा

सावन-भादों साठ ही दिन हैं फिर वो रुत की बात कहाँ
अपने अश्क मुसलसल बरसें अपनी-सी बरसात कहाँ

चाँद ने क्या-क्या मंज़िल कर ली निकला, चमका, डूब गया
हम जो आँख झपक लें सो लें ऎ दिल हमको रात कहाँ

पीत का कारोबार बहुत है अब तो और भी फैल चला
और जो काम जहाँ को देखें, फुरसत दे हालात कहाँ

क़ैस का नाम सुना ही होगा हमसे भी मुलाक़ात करो
इश्क़ो-जुनूँ की मंज़िल मुश्किल सबकी ये औक़ात कहाँ




स्वर-छाया गांगुली
नज़्म- इब्ने इंशा


फ़र्ज़ करो हम अहले वफ़ा हों, फ़र्ज़ करो दीवाने हों
फ़र्ज़ करो ये दोनों बातें झूठी हों अफ़साने हों

फ़र्ज़ करो ये जी की बिपता, जी से जोड़ सुनाई हो
फ़र्ज़ करो अभी और हो इतनी, आधी हमने छुपाई हो

फ़र्ज़ करो तुम्हें ख़ुश करने के ढूंढे हमने बहाने हों
फ़र्ज़ करो ये नैन तुम्हारे सचमुच के मयख़ाने हों

फ़र्ज़ करो ये रोग हो झूठा, झूठी पीत हमारी हो
फ़र्ज़ करो इस पीत के रोग में सांस भी हम पर भारी हो

फ़र्ज़ करो ये जोग बिजोग का हमने ढोंग रचाया हो
फ़र्ज़ करो बस यही हक़ीक़त बाक़ी सब कुछ माया हो


चित्र-गूगल

13 टिप्पणियाँ:

प्रवीण पाण्डेय said...

वाह।

Sonal Rastogi said...

इस भीगे मौसम को और रूमानी बनाने के लिए धन्यवाद

मनोज कुमार said...

उम्दा प्रस्तुति।

Anita said...

लाजवाब कृतियाँ ! बहुत बहुत शुक्रिया इन्हें पढवाने का !

पुष्पेन्द्र वीर साहिल said...

many Thanks... Is mausam mein ye padh ke aanand aa gaya.... !!

वन्दना said...

dono shandar kritiyan padhwane ke liye aabhaar.

arvind said...

उम्दा प्रस्तुति।

sushma 'आहुति' said...

बहुत ही खूबसूरती प्रस्तुती... ...

डॉ. मनोज मिश्र said...

बहुत खूबसूरत,बेहतरीन प्रस्तुति।

निर्मला कपिला said...

वाह लाजवाब पेअस्तुति। धन्यवाद।

singhSDM said...

बहुत खूब !
दिल को छू जाने वाली सुन्दर और सार्थक प्रस्तुति. छाया गांगुली की आवाज़ का जादू और इब्ने इंशा का जलवा कहर बरपा रहा है....!!

Mrs. Asha Joglekar said...

बढिया प्रस्तुति ।

Jeet said...

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