Friday, July 22, 2011

जब-जब दर्द का बादल छाया/जावेद अख़्तर

अरसे बाद कोई फ़िल्म समझ आई ,अच्छी लगी … लौटे तो ये नज़्म भी साथ लौटी …



जब-जब दर्द का बादल छाया
जब ग़म का साया लहराया
जब आंसू पलकों तक आया
जब ये तन्हा दिल घबराया

हमने दिल को ये समझाया
दिल आख़िर तू क्यों रोता है
दुनिया में यों ही होता है

ये जो गहरे सन्नाटे हैं
वक़्त नें सबको ही बांटे है
थोड़ा ग़म है सबका क़िस्सा
थोड़ी धूप है सबका हिस्सा
आंख तेरी बेकार ही नम है
हर पल एक नया मौसम है
क्यों तू ऐसे पल खोता है
दिल आख़िर तू क्यों रोता है



आवाज़-फ़रहान अख़्तर
नज़्म-जावेद अख़्तर
फ़िल्म-ज़िंदगी न मिलेगी दोबारा



साथ ही तरकश से जावेद अख़्तर की एक और नज़्म याद आयी-बीमार की रात

दर्द बेरहम है
जल्लाद है दर्द
दर्द कुछ कहता नहीं
सुनता नहीं
दर्द बस होता है
दर्द का मारा हुआ
रौंदा हुआ
जिस्म तो अब हार गया है
रूह ज़िद्दी है
लड़े जाती है
हाँपती
कांपती
घबराई हुई
दर्द के ज़ोर से
थर्राई हुई
जिस्म से लिपटी है
कहती है
नहीं छोडूंगी
मौत
चौखट पे खड़ी है कब से
सब्र से देख रही है उसको
आज की रात
न जाने क्या हो

15 टिप्पणियाँ:

पुष्पेन्द्र वीर साहिल said...

नज़्म वाकई खूबसूरत है..!!! THANKS...

सागर said...

hmm....
aisa hai ! aisa hai to aaj sundar hai.

sushma 'आहुति' said...

दोनों ही काफी अच्छे है..

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

बहुत सुन्दर चयन किया है नज्मों का ...आभार

मनोज कुमार said...

वाह!!
बहुत अच्छा!!

Pradip said...

the movie is good, no doubt... the poems, especially the second last one, after imran met his father, was awesome... dhobi ghaat ke baare mein apki kya rai hai... i liked that movie too

पारुल "पुखराज" said...

प्रदीप जी
ये नज़्म इसलिए भी ख़ास के
शायद जावेद और फरहान की असल ज़िंदगी
झलकती है इसमें कहीं न कहीं .
वो एक द्रश्य पूरी फ़िल्म की रूह है

बाकी
मै आज की फ़िल्में वक्त निकालकर अपने ९ साल के बेटे की
वजह से देखती हूँ ...और अपनी ख़्वाहिशों की पिटारी में
बहुत सारी अपनी पसंद की फिल्में इकट्ठा करती जा रही हूँ
के फुर्सत में उन्हें देखा जाएगा
धोबी घाट भी शायद

रंजना said...

वाह....

बेहतरीन...

आनंद आ गया सुनकर/पढ़कर

फिल्म देखनी पड़ेगी...

आभार बाँटने के लिए....

प्रवीण पाण्डेय said...

बहुत सुन्दर, दर्द तो न जाने क्या क्या सिखा देता है।

अनामिका की सदायें ...... said...

dono chunaav bahut hi jabardast.

Manish Kumar said...

bahut khoob..share karne ke liye shukriya

नीरज गोस्वामी said...

ज़िन्दगी जीना आना चाहिए...बातों को सरलता से लें उन्हें क्लिष्ट न बनाये...बस फिर ज़िन्दगी में सिवा आनंद के कुछ नहीं मिलेगा...आपको फिल्म अच्छी लगी, हम भी देखेंगे...नहीं तो डी.वी.डी.ले आयेंगे...घर के सन्नाटे में फिल्म देखने का आनंद ही कुछ और है...मैंने अपनी पसंद की ढेरों फिल्म ऐसे ही देखी हैं...
जावेद साहब की तरकश से नज़्म पढवाने का शुक्रिया...ये किताब मेरे भी पास है...

नीरज

daanish said...

नज़्म पढ़ कर
कुछ तो था,
जो पुर-सुकूँ लगा

डॉ. मनोज मिश्र said...

बहुत सुन्दर.

Anonymous said...

Thnx for sharing.When children accompany parents to watch good movies,over a period of it helps it helps in refining their taste.