Saturday, July 16, 2011

फिर सावन/फिर चाँद



फिर चाँद

बेपर्वा
घुलता रहा कल रात
आषाढ़ का अंतिम पहर
किसी अजाने पेड़ के बौर से
महकता रहा पुरवा का पोर-पोर
दरो दीवार बेसाख्तः सोंधाने लगे..
लहर-लहर मेघ चूमते रहे
पूर्णमासी का उजला चाँद
सुधियों की चाप से
कई बार साँकल खड़की
न किवाड़ खोले मैंने
न कोई भीतर आया
स्याह घड़ी
ढ़लती रही,संभलती रही …





फिर सावन

हम सारे
एक ही पगडंडी पर
अपनी- अपनी
अधजल गगरी लिए
संभल-संभल पग धरते ,बढ़ते ,
टोकते , एक दूजे को
कि देखो राह संकरी पर
आषाढ़ की छोड़ी हुई फिसलन है ,
सर पर...मेघों भरा आसमान…

आंखों में, हरापन एहतियात से
भरना
किसी हाल…सावन को दोष न जाए
अबकि





चित्र-गूगल

15 टिप्पणियाँ:

sushma 'आहुति' said...

खुबसूरत सावन...

प्रवीण पाण्डेय said...

सावन का हौले हौले मन में भर जाना, वाह।

Kajal Kumar said...

वाह
दोनों ही सुंदर रचनाएं

पुष्पेन्द्र वीर साहिल said...

घुलता रहा.. बहुत सुन्दर...

Hari Shanker Rarhi said...

बड़ी कोमल अभिव्यक्ति है। लगता है कि वर्षा की फुहारें पड़ रही हैं।

डॉ. मनोज मिश्र said...

खूबसूरत रचनाएँ,आभार.

induravisinghj said...

आया सावन चुपके-चुपके...
बहु ही खूबसूरती से...

नवीन रांगियाल said...

sach hai aur sundar bhi...

दीपशिखा वर्मा / DEEPSHIKHA VERMA said...

बहुत खूबसूरत !

रंजना said...

आषाढ़ की छोडी हुई फिसलन पर मन का फिसलना.....वाह...वाह....वाह...क्या बिम्ब प्रयुक्त किये तुमने...

दोनों ही रचनाएं मन को मोह लेने वाली...

रजनीश तिवारी said...

sundar rachna ...

नीरज गोस्वामी said...

आप बस आप ही हैं...शब्दों का ऐसा सुन्दर कोलाज बनाती हैं के बस...कुछ कहने से बहुत कुछ छूट जाने का भय होता है...इसलिए और कुछ नहीं कहता...

नीरज

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ (Zakir Ali 'Rajnish') said...

दोनों कविताएं लाजवाब करती हैं। बधाई।

------
बेहतर लेखन की ‘अनवरत’ प्रस्‍तुति।
अब आप अल्‍पना वर्मा से विज्ञान समाचार सुनिए..

prkant said...

अच्छी रचनाएं । तन मेरा सावन हुआ , मन मेरा आसाढ़......

harminder singh said...

रचनायें छूकर करीब से गुजरीं, फिर पता लगा कि वहीं रह गयीं....

मैंने आपके ब्लॉग की आज ढेर सारी रचनायें पढ़ डालीं....

पढ़कर बहुत अच्छा लगा....

लगता है अब आपके ब्लॉग पर आना-जाना लगा रहेगा...

आभार....