
फिर चाँद
बेपर्वा
घुलता रहा कल रात
आषाढ़ का अंतिम पहर
किसी अजाने पेड़ के बौर से
महकता रहा पुरवा का पोर-पोर
दरो दीवार बेसाख्तः सोंधाने लगे..
लहर-लहर मेघ चूमते रहे
पूर्णमासी का उजला चाँद
सुधियों की चाप से
कई बार साँकल खड़की
न किवाड़ खोले मैंने
न कोई भीतर आया
स्याह घड़ी
ढ़लती रही,संभलती रही …

फिर सावन
हम सारे
एक ही पगडंडी पर
अपनी- अपनी
अधजल गगरी लिए
संभल-संभल पग धरते ,बढ़ते ,
टोकते , एक दूजे को
कि देखो राह संकरी पर
आषाढ़ की छोड़ी हुई फिसलन है ,
सर पर...मेघों भरा आसमान…
आंखों में, हरापन एहतियात से
भरना
किसी हाल…सावन को दोष न जाए
अबकि …
चित्र-गूगल
15 टिप्पणियाँ:
खुबसूरत सावन...
सावन का हौले हौले मन में भर जाना, वाह।
वाह
दोनों ही सुंदर रचनाएं
घुलता रहा.. बहुत सुन्दर...
बड़ी कोमल अभिव्यक्ति है। लगता है कि वर्षा की फुहारें पड़ रही हैं।
खूबसूरत रचनाएँ,आभार.
आया सावन चुपके-चुपके...
बहु ही खूबसूरती से...
sach hai aur sundar bhi...
बहुत खूबसूरत !
आषाढ़ की छोडी हुई फिसलन पर मन का फिसलना.....वाह...वाह....वाह...क्या बिम्ब प्रयुक्त किये तुमने...
दोनों ही रचनाएं मन को मोह लेने वाली...
sundar rachna ...
आप बस आप ही हैं...शब्दों का ऐसा सुन्दर कोलाज बनाती हैं के बस...कुछ कहने से बहुत कुछ छूट जाने का भय होता है...इसलिए और कुछ नहीं कहता...
नीरज
दोनों कविताएं लाजवाब करती हैं। बधाई।
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बेहतर लेखन की ‘अनवरत’ प्रस्तुति।
अब आप अल्पना वर्मा से विज्ञान समाचार सुनिए..
अच्छी रचनाएं । तन मेरा सावन हुआ , मन मेरा आसाढ़......
रचनायें छूकर करीब से गुजरीं, फिर पता लगा कि वहीं रह गयीं....
मैंने आपके ब्लॉग की आज ढेर सारी रचनायें पढ़ डालीं....
पढ़कर बहुत अच्छा लगा....
लगता है अब आपके ब्लॉग पर आना-जाना लगा रहेगा...
आभार....
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