Monday, June 13, 2011

नींद बरसों जो मुझको आई नही , नींद आई तो फिर बड़ी बेढ़ब


नींद टूटे तो कोई बात कहूँ
नींद रूठे तो कोई बात सहूँ
नींद बख़्शे तो चार सू देखूं
नींद बाहर भी एक दुनिया है .

नींद बरसों जो मुझको आई नही
नींद आई तो फिर, बड़ी बेढ़ब
पुतलियाँ चीर अटकने दे दीं
अब खुली आँख नींद-नींद में हूँ .

नींद सिरहाने मिरे,नींद पैताने
नींद में चलना, नींद में फलना
नींद में सीना है, पिरोना है
नींद में ओढ़ना-बिछौना है .

रोज़ इक सहर नींद में उगनी
नींद में शाम डूब जानी है
नींद में ज्वार भी , समंदर भी
नींद में धूल भी , बवंडर भी .

ज़र्द वादों की इक पिटारी है
नींद में धूप सी दिखानी है
नींद में अलगनी लगानी है
नींद में छांह बेच आनी है

नींद में ग़मज़दा है तन्हाई
नींद में खौफ़नाक रुसवाई
नींद में ग़ार , नींद में परबत
नींद में ढाल है..चढ़ाई भी

नींद में रोटियाँ पकानीं है
नींद में कौरियों खिलानी है
नींद में आंच भी बढानी है
नींद में राख भी बुझानी है

नींद बख़्शे तो चार सू देखूं
नींद बाहर भी एक दुनिया है
नींद बरसों जो मुझको आई नही
नींद आई तो फिर बड़ी बेढ़ब .



चित्र-गूगल

18 टिप्पणियाँ:

Pratibha Katiyar said...

De do na thodi si mujhe bhi parul...neend ki dua hi sahi.

sidheshwer said...

संवेदना की अप्रतिम ऊँचाई और अभिव्यक्ति का सहज तारतम्य...

Anita said...

आपकी सुंदर कविता ने निशब्द कर दिया है...नींद के इतने सारे अनछुए पहलुओं को दिखाती और भीतर एक गहरी बात कई तरफ इशारा करती है...जो उस बात को पकड़ लेता है वह जाग जाता है वरना सारी उम्र सोते सोते ही गुजर जाती है....एक नई नींद में मुत्तला होने के लिये...

डॉ.राधिका उमडे़कर बुधकर said...

Isse kamal ki baat kya hain jo nind itni acchi Aayi ,varna log shikayat karte hain ki nind nahi aati ...kash har roz esi hi bachcho jaisi nind aaye:-)

पुष्पेन्द्र वीर साहिल said...

ek azab neend mein dubee hui, neend mein dubotee hui kavita...

bahut hee sundar...

नवीन रांगियाल said...

एक गाना याद आ रहा है ... मेने तुमसे कुछ नहीं माँगा ... आज दे दो... आज दे दो... सौ बरस से जगे इन नैनों को नींद का वरदान दे दो ...! फिल्म का नाम कथा और आवाज किशोर कुमार की ...

Udan Tashtari said...

नींद बख्शे तो टिप्पणी दे दूं....



नींद बख्शे तो चार सू देखूं...उम्दा रचना!!!

नीरज गोस्वामी said...

नींद को इतनी अलग अलग तरीकों से भी याद किया जा सकता है...यकीन नहीं होता ...वाह...एक बार फिर देखने को मिला है आपकी कलम का कमाल...

नीरज

अरूण साथी said...

बहुत सुंदर अभिव्यक्ति।

sushma 'आहुति' said...

bhut khubsurat...

AVADH said...

अति सुन्दर, सदैव की भांति.
अभी भी आपकी कविता के बहुत से मायने समझने की और कई बिम्ब तलाशने की कोशिश कर रहा हूँ.
शायद समझ में आ जाए.
लेकिन अत्यंत सरल शब्दों में पर बहुत गूढ़ कविता.
अवध लाल

varsha said...

वाह वाह क्या ज़कड़ा है हमें नींद में और रंगे हाथों पकड़ा है हमें नींद में...

daanish said...

नींद बख्शे तो चार सू देखूं ....

नींद से, गरचे, रु.ब.रु होते
नींद में होतीं नींद से बातें

बहुत खूब !!

प्रवीण पाण्डेय said...

वही एक रात थी सपनों में नहीं आयी।

prkant said...

डासत ही गयी बी्ति निशा सब
कबहुं न नाथ नींद भरि सोये !!!

अमिताभ त्रिपाठी ’ अमित’ said...

नींद बख़्शे तो...
मीर का अन्दाज़ दिखाई दिया इन पंक्तियों में
पूरी रचना ही गहरी सोच और अनुभूति से युक्त है, और अभिव्यक्ति भी सुन्दर है।
बधाई!
सादर

नरेन्द्र व्यास said...

अत्यंत ख़ूबसूरत ! अभिराम, अभिराम, अभिराम पुखराज के चाँद सी...! बधाई ! नमन !!

रंजना said...

ओह ...प्रशंसा को शब्द कहाँ से लाऊं...
क्या लिखा है...अद्वितीय अप्रतिम !!!!

लेखनी सलामत रहे तुम्हारी....ढेरों आशीष....