Thursday, June 2, 2011

एक वादे से क्या बदलता है…



दस साल का समय हमारे बीच , तेज़रफ़्तार झोंके की तरह गुज़र गया था । इसका एहसास पहली बार, कल आइसक्रीम पार्लर के बाहर गूँजती तुम्हारी आवाज़ ने दिलाया । देर रात आधी बंद दुकान की सीढियों पर तुम लगभग पुकार कर जता रहे थे - " देख रहा हूँ ,दस सालों में मेरा असर तुम्हारे ऊपर कम हो गया है "। इस अनायास धमाके से हम सब ,हंस पड़े थे । दो दिन की मुलाकात में कई दफ़ा इन वर्षों का ज़िक्र तुम्हारी ज़ुबान पर आया । कुछ एक बार जिसे मैने महसूस किया, और कई बार ख़ुद तक आने ही नही दिया । तुम्हारी छ्टपटाहट मुझे अखर रही थी,मैने बीती हुई चीज़ों का मन ही मन मुआयना किया ।

मै, वो नही रही थी,तुम भी कमोबेश बदले ही होगे । हालाँकि मैंने समझने की कोशिश नही की , और तुम भी अपने मनोभाव छिपाने में सफल रहे । मेरे नए से हो आए घर की तारीफ़ की तुमने,और मैने तुम्हारे शहर की आबो-हवा की । तुमने सूँघने चाहे वे सारे पुराने दिन, जो हमने साथ गुज़ारे थे … कभी मूंगफली चुगते, तो कभी पत्थर हो आयी लिट्टी की, मेहनत से जुगाली करते हुए । उस लकड़ी की मेज़ से तुम्हारा पैर टकराया…जिसे 31 दिसंबर की रात मुझे हैरान करने के लिये, तुम अलाव के हवाले करने की सोच रहे थे । सहलाने चाहे वे तमाम ग़ैर जरूरी पल, जो अरसा हुए यहीं-कहीं घुल चुके थे । तुम,हम सबके चेहरों पर … कुछ खोज रहे थे ।


वो सब… जो तुम्हारी नज़र में,बहुत पीछे-- दस बरस पहले… इस शहर में थम गया था … उसे टटोलते हुए मै तकलीफ़ से तुम्हे देखती रही । तुम्हारी बेकली,तैर कर वापस जाने की तुम्हारी मशक्कत …

चलते वक़्त जूते में पैर फँसाते हुए मेरे पूछने पर कि - "अब कब आओगे?" तुमने कहा… "पता नहीं "। "आने का वादा कर जाओ तो ज़रूर आ पाओगे" ये कहकर मै आगे बढ़ चुकी थी…कि कार में बैठते हुए तुम बोल पड़े - "आऊँगा पक्का" ।

एक वादा ले लेने भर से ,कुछ ही पलों में…तुम्हारे भीतर क्या बदल गया होगा……मै जानना नही चाहती ,सोचना भी नहीं । एक ख़्याल कौंधा सिर्फ़ - "कहीं से सदा के लिये लौटना तभी मुमकिन,जब एक आखिरी बार वहां जा कर वापस आया जाये।"

ऐसा ही एक और वादा,किसी भरी दोपहर का,ज़हन में… तैरने लगा । वो तारीख़ इन्ही दिनो पड़ती थी । उस दोपहर-बेढ़ब,उमस भरे शहर में कोई भी रास्ता सीधे नही जाता था,या शायद कहीं नहीं जाता था। किसी के घर जाने के लिए निकले दो लोग,कहीं पहुंचे ही नही। पूरी दोपहर, धूप सने शहर में टेढ़ी-मेढ़ी सड़कों की धूल फांकते रहे । ऐसा भी नही था, कि कहीं दो घड़ी की छांह वे चाहते, तो उन्हें नसीब न होती । पर उस रोज़ उन्हे, धूप-धूप ही चलना था । अपने ही घर के आहाते के बाहर, एक ने दूर से दिखाया था…"देखो मै वहां रहता हूँ । वहाँ घने पेड़ हैं,और उसमे एक चिड़िया रहती है, पर आज इस वक़्त, दो घूंट पानी भी किसी बहाने से तुम्हे वहां नही मिलेगा" ।

वो, अजब दिन था ।

फिर विदा लेते हुए, एक ने कहा था- "देखो तोड़ना मत" और जवाब में एक वादा ही उसे मिला था कि -"ये टूट नही सकता" । उस पल के बाद, सालों बादल छाये रहे… समय, पानी पे पत्ते की तरह बह निकला ।

आज इस साँझ , मन सुनता है --"ग़ज़ब किया तेरे वादे पे ऐतबार किया" …



चित्र-गूगल

17 टिप्पणियाँ:

सागर said...

ये भी अजब दिन है.

Pratibha Katiyar said...

Wakai gajab kiya Parul...!

प्रवीण पाण्डेय said...

हृदय उड़ीलती हुयी पंक्तियाँ।

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

पुरानी यादों की गलियों में घूम कर भी मन यही सुनता है .. गज़ब किया तेरे वादे पे ऐतबार किया ..अच्छी प्रस्तुति ..

नीरज गोस्वामी said...

वक्त ने किया क्या हंसी सितम...तुम रहे ना तुम हम रहे ना हम...
आप तो कुछ भी लिखें वो अपने आप एक कविता का रूप धारण कर लेता है...काव्य आपकी पहचान है...एक अत्यधिक संवेदनशील इंसान ही कविता में जी सकता है...सशक्त पोस्ट

नीरज

ललित शर्मा said...

बीते दिनों की यादे रह-रहकर कर आती हैं।
जिस तरह बादलों से बिजली चमक जाती है॥

आभार

स्वप्निल कुमार 'आतिश' said...

ke khushi se mar n jaate...... :)

kai afsaanon kee galiyon men le gayi aapki post.... :)

Er. सत्यम शिवम said...

आपकी उम्दा प्रस्तुति कल शनिवार (04.06.2011) को "चर्चा मंच" पर प्रस्तुत की गयी है।आप आये और आकर अपने विचारों से हमे अवगत कराये......"ॐ साई राम" at http://charchamanch.blogspot.com/
चर्चाकार:-Er. सत्यम शिवम (शनिवासरीय चर्चा)
स्पेशल काव्यमयी चर्चाः-“चाहत” (आरती झा)

Patali-The-Village said...

हृदय उड़ीलती हुयी पंक्तियाँ। धन्यवाद|

Sonal Rastogi said...

bhari garmi mein rumaniyat.... waah chalo hum hee akele nahi hai

डा० अमर कुमार said...

.जिन्हें हम भूलना चाहें, वो अक्सर याद आते हैं !

pallavi trivedi said...

आज यादों की गलियों के फेरे का ही दिन है...

कंचन सिंह चौहान said...

सहमत पल्लवी से

Udan Tashtari said...

क्या याद किया...वाकई गज़ब किया.

Anita said...

रोचक, हार्दिक रचना !

Kailash C Sharma said...

बेहद मर्मस्पर्शी रचना..

sushma 'आहुति' said...

bhut sarthak post har pankti dil chuti hui...