
शुक्र, बड़ा मेरे मालिक !
तू रहमदिल..अदाकार है ।
ह़र हंसी के एवज़ बख़्शा है
एक आंसू
ह़र छांह भरी राह के मुहाने
बसाये, धूप भरे गाँव हैं ।
नवाज़ा है ठुकराने वाले को
ठोकर से,
बेईमान को बेईमानी से ,
तुरत के तुरत ।
अगले-पिछले जन्मों के खाते
न अब संभालता है ,ना ही बांटता है
केंचुओं ,घोंघों,छिपकली के कलेवर
पाप-पुण्य के आधार पे
हिसाबन, यहीं दिखा देता है
दोज़ख़ की आग ।
जन्म-जन्मांतरों की "बही" समेट कर
सुनियोजित कर लिया है
तूने अपना कारोबार ।
शुक्र ,बड़ा मेरे मालिक !
तू रहमदिल..अदाकार है ।
चित्र-गूगल
13 टिप्पणियाँ:
बेहतरीन शब्द रचना ।
badhiyaa
वाह उपरवाला अब सब फैसले यहीं कर देता है ...कितनी गहरी रचना ..बार बार पढने योग्य
बहुत सुंदर रचना . ..
सच है....हिसाब यहीं बराबर हो जाया करता है....
गहन गंभीर रचना...
ऊपर वाला सबका हिसाब करता है।
बहुत खूब! क्या बात है! वाह!
अवध लाल
हिसाबन, यहीं दिखा देता है
दोज़ख़ की आग ।
जन्म-जन्मांतरों की "बही" समेट कर
सुनियोजित कर लिया है
तूने अपना कारोबार ।
यहीं जन्नत है तो यही दोज़ख ..सब हिसाब बराबर
पारुल जी आप धीर गंभीर बातें कितनी सहजता से अपनी रचनाओं में कह जाती हैं...ये आपके लेखन की ताकत है के पाठक बिना वाह किये रह ही नहीं सकता...
नीरज
कितना कठिन सच सरलता से कह दिया... बहुत गहरा भाव लिए हुए रचना ...
सब हाथ के हाथ ... यहीं पे....
बहुत अच्छी लगी .....
बहुत ही अच्छा लिखा है ।
काश! विधाता ऐसा ही करता.... लेकिन अगर कहीं हुआ है तो उसका यह कदम सराहनीय और स्वागत योग्य है। रहमदिल....मालिक... का...
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