Monday, May 23, 2011

हिसाबी


शुक्र, बड़ा मेरे मालिक !
तू रहमदिल..अदाकार है ।

ह़र हंसी के एवज़ बख़्शा है
एक आंसू
ह़र छांह भरी राह के मुहाने
बसाये, धूप भरे गाँव हैं ।
नवाज़ा है ठुकराने वाले को
ठोकर से,
बेईमान को बेईमानी से ,
तुरत के तुरत ।

अगले-पिछले जन्मों के खाते
न अब संभालता है ,ना ही बांटता है
केंचुओं ,घोंघों,छिपकली के कलेवर
पाप-पुण्य के आधार पे


हिसाबन, यहीं दिखा देता है
दोज़ख़ की आग ।
जन्म-जन्मांतरों की "बही" समेट कर
सुनियोजित कर लिया है
तूने अपना कारोबार ।

शुक्र ,बड़ा मेरे मालिक !
तू रहमदिल..अदाकार है


चित्र-गूगल

13 टिप्पणियाँ:

सदा said...

बेहतरीन शब्‍द रचना ।

रश्मि प्रभा... said...

badhiyaa

Sonal Rastogi said...

वाह उपरवाला अब सब फैसले यहीं कर देता है ...कितनी गहरी रचना ..बार बार पढने योग्य

शिवकुमार ( शिवा) said...

बहुत सुंदर रचना . ..

रंजना said...

सच है....हिसाब यहीं बराबर हो जाया करता है....

गहन गंभीर रचना...

प्रवीण पाण्डेय said...

ऊपर वाला सबका हिसाब करता है।

AVADH said...

बहुत खूब! क्या बात है! वाह!
अवध लाल

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

हिसाबन, यहीं दिखा देता है
दोज़ख़ की आग ।
जन्म-जन्मांतरों की "बही" समेट कर
सुनियोजित कर लिया है
तूने अपना कारोबार ।

यहीं जन्नत है तो यही दोज़ख ..सब हिसाब बराबर

नीरज गोस्वामी said...

पारुल जी आप धीर गंभीर बातें कितनी सहजता से अपनी रचनाओं में कह जाती हैं...ये आपके लेखन की ताकत है के पाठक बिना वाह किये रह ही नहीं सकता...
नीरज

मीनाक्षी said...

कितना कठिन सच सरलता से कह दिया... बहुत गहरा भाव लिए हुए रचना ...

पुष्पेन्द्र वीर साहिल said...

सब हाथ के हाथ ... यहीं पे....

बहुत अच्छी लगी .....

नूतन .. said...

बहुत ही अच्‍छा लिखा है ।

अमिताभ त्रिपाठी ’ अमित’ said...

काश! विधाता ऐसा ही करता.... लेकिन अगर कहीं हुआ है तो उसका यह कदम सराहनीय और स्वागत योग्य है। रहमदिल....मालिक... का...