
सूर्यमुखी,
किसकी बाट में जग रहे हो ?
किस बनैले राग में पल रहे हो…
वैशाखी रजनी सुनाती लोरी
सुनहली पलकें,तनि झपक लो
झुका लो गर्दन ,बुझा दो आँखें
गगन के चँदा को जाग दे दो
ये साज-सज्जा उतार फेंको
ये मुस्कुराहट उधार दे दो
उजाले कंदीलों में सो चुके हैं
तपा दिवस राख हो चला है
किसकी बाट में जग रहे हो ?
किस बनैले राग में पल रहे हो…
कि सूर्य देखो, कहीं नहीं है
कि सूर्य देखो कहीं नहीं
अब ……
तनि-थोड़ा
राग-स्नेह
चित्र-गूगल साभार
10 टिप्पणियाँ:
सुन्दर भावाव्यक्ति…
जलते हैं फिर भी सूर्य को ही निहारते हैं।
ये किसकी बाट में जल रहे हो ?
ये किस बनैले राग में पल रहे हो…
कि सूर्य देखो, कहीं नहीं अब... bahut khoob
प्रेम के राग को कैसे भूले ...सुन्दर रचना
अति सुन्दर.
सदैव की भांति,
आभार
अवध लाल
सूरजमुखी भी हमारी तरह इंसोम्निया का शिकार हो रहा है क्या?
वह तो बना रहे - जो है - सूरजमुखी।
सूरजमुखी को मुखातिब खूबसूरत शब्दों से सजी पठनीय कविता !
स्नेह और आकर्षण
के उत्तम प्रभाव को
मानो
अनुपम शब्द मिल गए हों .....
अच्छी परिभाषा !
बेहतर काव्य !!
मन को छू गया.
कितनी सुंदर और सटीक अभिव्यक्ति.
संवेदनशील और मधुर सब्दो की लय.
आपको सादर प्रणाम!
खूबसूरत... उजाले कंदीलों में सो चुके हैं.. बहुत सुन्दर टिप्पणी कृत्रिमता पर...
बहुत बहुत शुक्रिया...
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