Friday, May 6, 2011

बैरागी अमलतास


कुल्हाड़ी की पहली चोट से उठने वाली आवाज़ बता रही है , किसी को बहुत ज़रूरत हो आई है आज सूखी लकड़ी की…दोपहर में अंदर बैठी , सुनती हूँ । चाह कर भी रोक नहीं सकती उसे । टोकने पर यकीनन अजीब निगाहों से तरेर कर पूछेगा , आपको सड़क पर खड़े बेरंग काठ के टुकड़े से क्या मतलब... मेरा कुछ रोज़ चूल्हा जलेगा । घर वाले सोंधी रोटी पाएंगे ।

किस जतन से उसे रोकूँ ? न, नही रोक सकती । रोक तो ख़ैर कुछ भी नही पाई…न लोगों को, ना ही उन आठ,नौ-सौ पेड़ों को, जो काट दिये गये शहर के बीचो-बीच…एक अदद मौल के लिये । जिनका घना, हरापन अंडमान के वर्षावनों की याद दिलाता था । उस बेशकीमती हरियाली की तबाही पर उदास होने के इलावा मैने क्या किया.. जो अब इस ठूँठ के विनाश पर कर सकूँ ।


काटे जा रहे सूखे पेड़ से मुझे क्या निस्बत , क्या हासिल ? सिवाय इसके कि इसे दिन में कई दफ़ा बेवजह निकल कर देखती रही हूँ । अपने हरेपन से ज़्यादा इसने इस रूखे वेश से मेरा ध्यान खींचा है । पास में रहने वाले सिंह साहब की पत्नी का असमय देहांत हुआ,वे जब इस के पास से गुज़रते ,मेरे आगे बेचैनी भरा दृश्य उभर आता । ज़हन के अंधेरों से आवाज़ आती "यूँ ही जीवन रीत जाता है" .

आते-जाते, रात-बेरात फूलों भरे बगीचे के बीच बीच, नज़र ठहरती काले पड़ आये इस अमलतास के पेड़ पर । उसके ठीक पीछे तमाम चौड़े पत्ते वाले झारखंडी वृक्ष लहराते, हरे-भरे । हम दोनों (मै और अमलतास) उन्हें देखकर मुस्कुराते …न जाने क्यों । शहर से बाहर जाने पर मन ही मन उसे कह जाती.. ज़रा देखे रहना घर हमारा ।

सड़क से थोड़ा ऊपर हटकर जहां मिट्टी उँची है, आकाश की ओर… हवा में दोनो बाहें फैलाये वर्षों से खड़ा था… ये सूखा अमलतास का पेड़ । जाड़ों की शुरुआत में किस्म -किस्म के लोग,जिनमे रिक्शेवाले,चौकीदार,सफ़ाई कर्मी सभी शामिल होते , आते और पेड़ को देख, छू कर गोल-गोल चक्कर काटकर वापस चले जाते । ह़र बार तसल्ली होती और थोड़ी बहुत खुशी भी…उसके बच जाने की । मै फिर उसे नई नज़रों से निहारती । उसका गेट के सामने रहना , किसी पुराने मित्र के होने जैसा रहा ।

कभी ये अमलतास का पेड़ पीले फूलों से भर जाता था और तेज़ हवाओं से वे सारे फूल मेरे आहाते में लगे छोटे-छोटे पौधों पर खिल जाते । बेले,चाँदनी ,रातरानी के पेड़ों पर अमलतास ही अमलतास । ६-७ सालों तलक पेड़…फूल, छाया पंछियों और घोसलों से भरा-पुरा रहा । फिर किसी गरमी की दोपहर इसने अपनी छाया समेटी तो इसके नीचे की सारी दूब जल गयी । धीरे धीरे इसने सदा के लिए पतझड़ पहन लिया . इसके सारे पंछी उड़ गए और तेज़ हवाएं घोंसलों का रेशा-रेशा बहा ले गयीं … बिना पत्तियों का ये पेड़ फिर पूरे चौमासे भीगता रहा…… अकेले ,जड़ । देख कर लगता किसी से रूठ कर इसने ख़ुद को सज़ा सुनायी है ।

आहिस्ता -आहिस्ता इसकी सूखी डालियां और तना काले पड़ गए । एक आध बार सुबह का कोई पखेरू आ कर अपनी चोंच रगड़कर साफ़ करता और फिर ऊब कर उड़ जाता । यूँ लगता जैसे पेड़ को अब किसी का इंतज़ार नही रहा । अडिग,बैरागी सा… ख़ामोश आते-जाते राहगीरों को देखता, सुनता रहता । कभी खिड़की से, कभी गेट पर , तो कभी बाहर सड़क पर टहलते हुए उसे देखती, सोचती शायद अब ये भी मुझे पहचानता होगा ।

हथेलियों और पैरों के तलवों में जलन महसूस होने लगी है । बाहर बेहद गर्मी है ध्यान देने पर सड़क पार पसरा सन्नाटा सुन सकती हूँ । ज़रूरतमंद अपने हिस्से की लकड़ी ले कर जा चुका …शायद । अब आती होंगी काम करने वाली बाइयां , जो घास पर बिखरी छीलन बटोरेंगी । मै जा कर देखती हूँ घिरती हुई सांझ में , अमलतास अब एक हाथ से दुआ में है ।



चित्र-गूगल साभार

12 टिप्पणियाँ:

nilesh mathur said...

संवेदनशील व्यक्ति ही ये दर्द समझ सकता है, बहुत सुन्दर!

Pratibha Katiyar said...

गहन अनुभूति!

रश्मि प्रभा... said...

ज़रूरतमंद अपने हिस्से की लकड़ी ले कर जा चुका …शायद । अब आती होंगी काम करने वाली बाइयां , जो घास पर बिखरी छीलन बटोरेंगी ।...
अमलतास अब एक हाथ से दुआ में है .... kaafi kuch kah diya

pallavi trivedi said...

एक हरे भरे पेड़ से एक अनोखा नाता बन जाता है..और अपने सामने ही इसे सूखते देखना और फिर कटते... सचमुच बहुत प्यार है इस लेख में और उतना ही दर्द भी!

डॉ. मनोज मिश्र said...

भावपूर्ण रूपक/आलेख,आभार.

नीरज गोस्वामी said...

पारुल जी आप गद्ध्य में भी नज़्म लिख देती हैं...कमाल है...जिसे पढ़ कर आँखें डबडबा जाएँ उस रचना की प्रशंशा लफ़्ज़ों में नहीं की जा सकती...आपके पास जैसा संवेदनशील दिल है वैसा इश्वर सिर्फ अपने बहुत प्रिय को ही देता है.
खुश रहें.

नीरज

AVADH said...

बहुत सुन्दर.
सदैव की भांति एक उत्तम अभिव्यक्ति.
आभार
अवध लाल

Anita said...

पेड़ भी एक व्यक्तित्व रखता है, वह महसूस करता है अमलतास तक आपकी संवेदना जरूर पहुँच रही होगी !

singhsdm said...

पारुल जी
संवेदनशील पोस्ट. नाज़ुक एहसासों में रची बसी पोस्ट... जो जीवन के बीते हुए पन्नो को यकायक उलट पुलट कर देने में समर्थ है.
" कभी ये अमलतास का पेड़ पीले फूलों से भर जाता था और तेज़ हवाओं से वे सारे फूल मेरे आहाते में लगे छोटे-छोटे पौधों पर खिल जाते । बेले,चाँदनी ,रातरानी के पेड़ों पर अमलतास ही अमलतास । ६-७ सालों तलक पेड़…फूल, छाया पंछियों और घोसलों से भरा-पुरा रहा । फिर किसी गरमी की दोपहर इसने अपनी छाया समेटी तो इसके नीचे की सारी दूब जल गयी । धीरे धीरे इसने सदा के लिए पतझड़ पहन लिया . इसके सारे पंछी उड़ गए और तेज़ हवाएं घोंसलों का रेशा-रेशा बहा ले गयीं … बिना पत्तियों का ये पेड़ फिर पूरे चौमासे भीगता रहा…… अकेले ,जड़ । देख कर लगता किसी से रूठ कर इसने ख़ुद को सज़ा सुनायी है ।''

बहुत संवेदनशील पोस्ट....आभार!

sidheshwer said...

उदात्त संवेदनशीलता से परिपूर्ण.. और क्या कहूँ..बस यह शेर यद आ गया है..

ये एक पेड़ है आ इससे मिलके रो लें हम
यहां से तेरे मेरे रास्ते बदलते हैं।
- बशीर बद्र

पारुल "पुखराज" said...

उदास आँखों से आँसू नहीं निकलते हैं
ये मोतियों की तरह सीपियों में पलते हैं

उन्हें कभी न बताना मैं उनकी आँखें हूँ
वो लोग फूल समझकर मुझे मसलते हैं.
बशीर बद्र

mai majbuur ho gayi iske baqi sher kahane ko

दीपशिखा वर्मा / DEEPSHIKHA VERMA said...

पढ़ के चिल्लाता है मन- बचाइए न उस अमलतास को!