
छलयुक्त
विजय,मोक्ष
प्रेम,मित्रता
यहां तक…व्यवहार भी
स्वीकार नहीं
छलना मेरी प्रकृति नही
द्रोण नहीं
शकुनि नही
युधिष्ठिर नही
मै,रावण भी नहीं..
प्रपंच रच,असहनीय बोझ उठाना
आत्मा का स्वभाव नहीं
सीता
एकलव्य
कर्ण
और
हारी गयी
द्रौपदी
के मुख का
छला गया ओज हूँ..
कि छलने से अधिक ,
छले जाने में मेरा सर्वस्व
तृप्त है ।
चित्र-गूगल
24 टिप्पणियाँ:
कबीर ने इसे ही यूं कहा है -
कबिरा आप ठगायिये और न ठगिये कोय
आप ठगे सुख होत है और ठगे दुःख होय!
छले गए पुराणोक्त पात्रों का ओज आज भी कायम है न
आपकी कविता से फूटा पड़ रहा है !
कि छलने से अधिक,
छले जाने में मेरा
सर्वस्व तृप्त है।
स्त्री.... नारी... औरत....
और कहीं मन के बहुत पास
सीता
एकलव्य
कर्ण
और
हारी गयी
द्रौपदी
के मुख का
छला गया ओज हूँ
मै
कि छलने से अधिक ,
छले जाने में मेरा सर्वस्व
तृप्त है ।
गहन अभिव्यक्ति ...आज तक यह ओज कायम है और न जाने कब तक बना रहेगा
कि छलने से अधिक,
छले जाने में मेरा
सर्वस्व तृप्त है।
shukriya ki 1 april ke bavajood aapne hamari soch ko poornta di
कि छलने से अधिक,
छले जाने में मेरा
सर्वस्व तृप्त है।
अंतिम पंक्तियाँ दिल को छू गयीं सुन्दर रचना, बधाई
कविता की अंतिम पंक्तियाँ मानो ..स्त्री की सम्पूर्ण कथा/मनोव्यथा.
बहुत अच्छी कविता. बधाई.
आप इन पौराणिक और ऐतिहासिक पात्रों को कितनी सुन्दरता से जड़ लेती हैं अपने कर्णफूलों में... बहुत बधाई !
बहुत ही सुन्दर, छला जाना दुख देता है।
छलना मेरी प्रकृति नहीं
लेकिन
छले जाने में
मेरा तो सर्वस्व तृप्त नहीं होता...
Gaagar men saagar jaisi rachna.
-----------
क्या ब्लॉगों की समीक्षा की जानी चाहिए?
क्यों हुआ था टाइटैनिक दुर्घटनाग्रस्त?
chale jane mai sarvasv tript hotaa hai lekin ek kone mei dard bhi uthta hai.
चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर आपकी प्रस्तुति मंगलवार 05 - 04 - 2011
को ली गयी है ..नीचे दिए लिंक पर कृपया अपनी प्रतिक्रिया दे कर अपने सुझावों से अवगत कराएँ ...शुक्रिया ..
http://charchamanch.blogspot.com/
बहुत गहरी अभिव्यक्ति///
गहरे भाव ,सुंदर प्रस्तुति
यहाँ भी आयें|
कृपया अपनी टिपण्णी जरुर दें|
यदि हमारा प्रयास आपको पसंद आये तो फालोवर अवश्य बने .साथ ही अपने सुझावों से हमें अवगत भी कराएँ . हमारा पता है ... www.akashsingh307.blogspot.com
छलने से अधिक,
छले जाने में मेरा
सर्वस्व तृप्त है।... kitne gahre arth hain is tripti me
sab kuchh jante hue bhi use chhala jaanaa qubool hai
"naaree tum keval shraddhaa ho "
बेहतरीन अभिव्यक्ति………कुछ ऐसा ही मैने भी लिखा है ज़ख्म ब्लोग पर ……………"छलावा" ………इन्ही भावो को समेटा है।
http://redrose-vandana.zindagi.blogspot.com
gahre bhaw ke saath rachit rachna..:)
हम उसी से छले जाते हैं , जिसे छलने की अनुमति हम दे चुके होते हैं । अर्थात जिसे हम प्यार करते हैं, वही छलता है , इसीलिए छले जाने में एक तृप्ति का भाव है।
सहज ही कोई छले जाने को प्रस्तुत नही होता ।
"तृप्ति" मेरी, छली को… वह असहनीय पीड़ा ना लौटाने मे है…
प्रभावी
अत्यंत बलशाली!
जो छले जाने के उपरान्त भी स्थिर खड़ा रहता है
और छली को एकटक देख पाता है, उससे अधिक बलवान है कौन?
विश्व विजयी सा एहसास होता है!
बहुत बहुत पावरफुल अभिव्यक्ति.
A topic near to my heart thanks, ive been wondering about this subject for a while.
Post a Comment