Friday, February 11, 2011

दस्तूर यही …


कलंदर
डुगडुगी बजाता फिर चौक में
रुका हुआ करतब...बदस्तूर जारी…

सूर्य उत्तरायण हुए
उजाला साँझ को सामर्थ्य भर
पीछे धकेलेगा
वसंत की रात आहिस्ता-आहिस्ता
घिरेगी
तमाशबीन देर तक देख सकेंगे
बंदरिया का नाच

मदारी पुचकारेगा,
बंदरिया ठुमकेगी
पेट का हवाला देगा,
खाली झोली,फीका चेहरा
दिखायेगा,जतायेगा..
तू ही ज़मीन,
तू ही आसमान मेरा

बंदरिया
दूने उत्साह से कलाबाजी खाती
भूल जायेगी हरी-भरी शाखें
लपेटती जायेगी..नाचते हुए
बाजीगर की फेंकी रस्सी
डुलाती हाथ-पैर
कसती जायेगी ख़ुद को
गोल-गोल

नटी सी,
गली,मोहल्ले,शहर दर शहर
तचती ज़मीन ,बरखा-बूंदी
नज़रंदाज़ करती…
प्रेम वश
दिखलाएगी खेल पर खेल

करतबिया काँधे चढ़ी
इतराएगी नासमझ, अनजान
कि सर चढ़ाव,बहलाव है

राहगीर बजायेंगे ताली, लगायेंगे घेरा
पैसे फेकते, बीच-बीच पूछेंगे
बंदरिया नई लगती है ...

कलंदर बतलायेगा अदब से
मालिक
पुरानी कहा न मानी ,

जंगल छोड़ आया हूँ उसे
अकेली…




चित्र-गूगल साभार

11 टिप्पणियाँ:

प्रवीण पाण्डेय said...

गहरी पंक्तियाँ।

musaffir said...

नटी सी,
गली,मोहल्ले,शहर दर शहर
तचती ज़मीन ,बरखा-बूंदी
नज़रंदाज़ करती…
प्रेम वश
दिखलाएगी खेल पर खेल

bahut pyari rachna. aapka blog bahut achcha hai. aapke blog ko padhte huye meri urdu achchi ho jayegi

रंजना said...

निःशब्द कर दिया....

Kishore Choudhary said...

कितनी ही बार पढने के बाद और कई कई बार लिखने के बाद कोई बात कहने लायक बनी ही नहीं... इतना गुस्सा और इतना अदब मिल कर के क्या बन जाते हैं ?

सुनील गज्जाणी said...

नटी सी,
गली,मोहल्ले,शहर दर शहर
तचती ज़मीन ,बरखा-बूंदी
नज़रंदाज़ करती…
प्रेम वश
दिखलाएगी खेल पर खेल

bahut pyari rachna.

नीरज गोस्वामी said...

पारुल जी...अभी तो पढ़ कर लौट रहा हूँ आपकी रचना को...प्रशंशा के लिए उपयुक्त शब्द मिल जायेंगे तो लौटूंगा..

नीरज .

prkant said...

@ करतबिया काँधे चढ़ी
इतराएगी नासमझ, अनजान
कि सर चढाव,बहलाव है
.. बहुत बढ़िया. कविता वही अच्छी होती है जिसमें अर्थ के कई स्तर हों. यहाँ तो क्या कहने !

डॉ. मनोज मिश्र said...

गहन भाव,आभार.

संतोष कुमार said...

पारुल जी हमेशा की तरह एक बेहतरीन कविता !
शब्दों का चयन बहुत ही खूबसूरत है !

आभार !!

कंचन सिंह चौहान said...

वाह कहूँ या आह....???

'साहिल' said...

बहुत गहरी और खूबसूरत रचना !