चट्टानों बीच
सूखी मिट्टी की अंजुरी बना
जड़ें जमाते ,तिरछे हुए जाते…
गांवों की देहरियों पर
शाख़ें पसार, सजे बंदनवार
पतझड़ के माथे
जगमगाते,बहकाते…
राह के पलाश
टेक दिए ,
झोपड़ी की पिछली दीवार
मंदिर के गुम्बद से आँखे कर चार
संथाली धुन गुनगुनाते,रिझाते…
दामोदर सिरहाने,
दहकता मसान,लपटों की धूं-धूं में
व्याकुल मन प्राण
धीरज बंधाते…बहलाते…
राह के पलाश

पलाश

सेमल







चित्र-कैमरे से सेमल,पलाश
17 टिप्पणियाँ:
Oh palash, tum yahan bhi. Kya baat hai!
दहकते हुए पलाश .. इनसे निगाह हटी तो इतनी प्यारी नज़्म
अजीब पेड़ है ना...? बिना हरियाली के फूल खिलाता रहता है....!!!!!!!
पलाश की लाली आपकी कविता में बिखरी है।
खूबसूरत नज़्म के साथ चित्र भी मनमोहक हैं ..
पलाश के चित्र और उस पर रचित कविता दोनों अद्वितीय...आप कैमरे से भी कविता करती हैं...वाह...
नीरज
ओह ..ओह नही नही पारुल जी....aapne कुछ तस्वीरें सिम्मल के फूलों की लगा दी हैं ...पलाश के फुल वो नही हैं.....सिम्मल के फुल भी लाल होते हैं ..पर aapne कुछ तस्वीरें उसके फूलों की लगा दी हैं.....
पलाश और सिम्मल दो अलग अलग पेड़ हैं ......
पलाश तो मेरा बेइन्तिहाँ पसंदीदा फूल है ...
जहां पलाश के सौ गुण हैं वहीँ सिम्मल ...बेगुण मन जाता है
सिमल रुखु सराइरा अति दीरघ अति मुचु
ओइ जि आवहि आस करि जाहि निरासे कितु
फल फिके फुल बकबके कमि न आवहि पत ॥
"गुरु नानक जी"
आप चाहे "सिमल" शब्द नेट पे डाल के देख लें ......
हां मगर पलाश पे आपकी नज़्म बहुत प्यारी हे
shukriyaa zoya :)
चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर आपकी प्रस्तुति मंगलवार 01-03 - 2011
को ली गयी है ..नीचे दिए लिंक पर कृपया अपनी प्रतिक्रिया दे कर अपने सुझावों से अवगत कराएँ ...शुक्रिया ..
http://charchamanch.uchcharan.com/
मधुर गीत, सुन्दर चित्र... मनभावन
वाह!! बहुत उम्दा नज़्म और चित्रावली.
वाह-दमकते हुए पलाश.
सुन्दर चित्र... सुन्दर रचना
"मन में चाहे सहरा पाले हो
राहों में पलाश खिलाते चलो"
सेमल पलाश के फूल और छटा जैसे मंत्रमुग्ध सम्मोहित कर लिया करती है,ठीक वैसे ही तुम्हारी इस रचना ने भी कर लिया है...
बहुत चित्ताकर्षक चित्र हैं।
खूबसूरत रचना ,सुंदर चित्र
jitne khoobsurat phool..utni hi sundar rachna..bahut khoob
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