
हमने
लज़ीज़ ख़्वाब चखे
कि स्वाद उतर आए आँखों में
नज़र हो जाये तेज़
खेले
नाज़ुक सपने
कि रूखे हाथों पर हो असर
मिले नर्म एहसास
सुरीले सपने सुने
कि कमज़ोर कान पा पायें
आवाज़ों को पकड़ पाने की ताक़त
ख़्वाब रसभरे होठों से लगाये
कि खुश्क बातो में उतर आए
थोडा शहद
सजाये माथे पर
नखरीले सपने
कि उलझे दिमागों में सुलझ जाये
कोई गांठ
हमने सपनों को
ज़िंदों की तरह रौंदा,रुलाया
फिर भी न कर सके तृप्त
अंदरूनी अना
अंततः
अकबका कर उठे, खोल कर आँख
कि फिर होगी रात , फिर उतरेगा कोई
नया ख़्वाब…
चित्र-गूगल