
इतना मत बोलो
मत बोलो इतना
बोलने से
ज़्यादा
होती है बारिश
मचता है शोर
मानस में
द्वंद्वों का
न बोलो इतना…
बोलने से
अतिशय
आती है बाढ़
चढ़ता सैलाब
पलकों में
बूंदों का
इतना न बोलो……
बोलने से
अधिक
उड़ती है आँधी
उठता बवंडर
प्रश्नों पे
प्रश्नों का
मत इतना बोलो…
बोलने से
बेहद
उपजता है बंजर
पड़ता अकाल
शब्दों में
भावों का
इतना मत बोलो
मत बोलो इतना
चित्र-साभार
17 टिप्पणियाँ:
कैसे ना बोलूं पारुल जी कि बहुत सुंदर है ना बोलने की ये मनुहार.
बोलने पर प्रतिबन्ध,, भाई वाह...
बढ़िया प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई.
ढेर सारी शुभकामनायें.
संजय कुमार
हरियाणा
http://sanjaybhaskar.blogspot.com
अति का भला न बोलना ......सुन्दर रचना !
बहुत कोमल भाव और उतनी ही अच्छी अभिव्यक्ति!
बधाई!
सादर
बोलने से बेशक आँधी उठे पर ना बोलने से तो तूफान.
बेहतरीन रचना
बहुत ही लाजवाब रचना.
रामराम.
बहुत अच्छी प्रस्तुति!
बस जहाँ ज़रूरी है वहाँ बोलो ? सुन्दर कविता ।
बोलना ही तो जड़ है हर बात की...
शानदार अभिव्यक्ति!!
meri kavita to bilkul ult haI....]
GAHRA HO ANDHERA JAB
AWAAZ TAB DENA ZAROOR
KAHIN NA KAHIN
KADAM DHOONDH HI LENGE
ANDHERE KAA KINARA.......
आपकी पोस्ट पर कमेन्ट करने में हमेशा मुश्किल होती है...सिवाय वाह के और कोई शब्द सूझता ही नहीं...लेकिन इस बार एक नहीं तीन बार वाह वाह वाह करने को जी कर रहा है...
नीरज
बोल अबोले जो रहे ,वे बोले भरपूर !
बिन बोले ही बहुत कुछ ,कहते रहे फितूर !!
बिना बोले ही बोल रही हूँ !!!!! अति सुंदर .
वाह वाह पारुल जी ,
बोलने से बंजर उपजना .......क्या सच्ची अनुभूति है ....इसी अहसास ने
तो ये रचना लिखवा ली है आपसे !
मुक्त छंद में आप अत्यंत भाव प्रवणता से मुखरित होती हैं !
सुन्दर रचना .................बधाई !
जो है अकथ्य
उसी में छिपा है कथ्य.
बहुत ही बढ़िया..
सचमुच !!
अजीब दास्तां है ये, कहां शुरु कहां खतम....
नया खयाल है, रोचक और गर्मी की उमस में शीतलता, आंधी और बवंडर का एहसास कराता है.
बधाईयाम
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