
पूरे चाँद की इस ख़ामोश रात
पहाड़ की तलहटी में
उनींदे सायबान से
झिर-झिर कर
दिवंगत फागुन
और चैत के झुटपुटे में
ये किसके जी का ख़ालीपन
ये किसके जी का उजास
रिस रिस
नदी की छप-छप पार
उसी के सुरों में गुंथा जा रहा है...
ये कौन
ख़ल्वतों में आधी रात
बैंगनी फूलों के बयाबानों बीच
सिहरती हवा ,काँपती बेलों ,
सोये दरख्तों को
बैराग सिखा रहा है...
ये कैसे
पलकों में जाग भरे
रेतीले गले
पूरे चाँद की रात
कलपते
दूर बहुत दूर
इस बेला कोई
बिरहा गा रहा है
चित्र गूगल
19 टिप्पणियाँ:
बहुत अच्छी कविता।
दूर बहुत दूर कोई
इस बेला
बिरहा गा रहा है
बिरह की रात हो और कोई बैराग सिखाये तो बिरहा ही गाया जायेगा
सुन्दर भाव की बहुत सुन्दर रचना
विरह का विरहा !!!!!!!! वाह क्या बात है !!!
भावपूर्ण रचना के लिए बधाई!
"आपकी कविता पढ़ी ,आपने ऐसे शब्दों को चुना है जो कि आपकी कविता के भावों को व्यक्त करने में सशक्तता से आपके साथ खड़े हैं......."
प्रणव सक्सैना amitraghat.blogspot.com
wah!
बहुत सुन्दर भाव!
पलकों में जाग भरे
रेतीले गले....
पूरे चाँद की रात
कलपते..
दूर बहुत दूर
इस बेला कोई
बिरहा गा रहा है....
भावपूर्ण अभिव्यक्ति ...सशक्त शब्दों का चयन ...बधाई
बहुत अच्छी कविता।
पलकों में जाग भरे, रेतीले गले....सुभान अल्लाह....कहाँ से लाती है आप ऐसे लफ्ज़ अपनी रचनाओं में...वाह...आपके ज़ज्बात और लफ़्ज़ों के जादू से बचना ना- मुमकिन है...
नीरज
कम शब्दों में बहुत सुन्दर कविता।
बहुत सुन्दर रचना । आभार
ढेर सारी शुभकामनायें.
SANJAY KUMAR
HARYANA
http://sanjaybhaskar.blogspot.com
सोये दरख्तों को बैराग सिखा रहा है ।
अति सुन्दर भाव ।
क्या हसीं अंदाज़ है.शब्दों का इतना सटीक चयन वाक़ई , कविता को प्रभावी कर गया!
ये किसके जी का खालीपन !!! इस भरे पूरे चैत के महीने में ! लगता है कहीं होरी बिरहा गा रहा है !सुंदर कविता के लिए बधाई !चैत पर ही मेरी भी कविता है ! देख लीजियेगा !
खूबसूरत शब्दों से बुनी खूबसूरत कविता
बहुत अच्छी प्रस्तुति।
इसे 13.03.10 की चिट्ठा चर्चा (सुबह ०६ बजे) में शामिल किया गया है।
http://chitthacharcha.blogspot.com/
इसके लिये बस वाह !
ये किसके जी का ...
..
...
...उसी के स्वरों
सुन्दर अभिव्यक्ति।
"दिवंगत फागुन"...आह! सोचता हूँ अपने एक शेर के मिस्रे की खातिर इस बिम्ब को उधार माँग लूं आपसे।
कापी-राइट है?
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