Thursday, March 11, 2010

पूरे चाँद की इस ख़ामोश रात


पूरे चाँद की इस ख़ामोश रात
पहाड़ की तलहटी में
उनींदे सायबान से
झिर-झिर कर
दिवंगत फागुन
और चैत के झुटपुटे में
ये किसके जी का ख़ालीपन
ये किसके जी का उजास
रिस रिस
नदी की छप-छप पार
उसी के सुरों में गुंथा जा रहा है...
ये कौन
ख़ल्वतों में आधी रात
बैंगनी फूलों के बयाबानों बीच
सिहरती हवा ,काँपती बेलों ,
सोये दरख्तों को
बैराग सिखा रहा है...
ये कैसे
पलकों में जाग भरे
रेतीले गले
पूरे चाँद की रात
कलपते
दूर बहुत दूर
इस बेला कोई
बिरहा गा रहा है



चित्र गूगल

19 टिप्पणियाँ:

मनोज कुमार said...

बहुत अच्छी कविता।

M VERMA said...

दूर बहुत दूर कोई
इस बेला
बिरहा गा रहा है
बिरह की रात हो और कोई बैराग सिखाये तो बिरहा ही गाया जायेगा
सुन्दर भाव की बहुत सुन्दर रचना

सुशीला पुरी said...

विरह का विरहा !!!!!!!! वाह क्या बात है !!!

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

भावपूर्ण रचना के लिए बधाई!

Amitraghat said...

"आपकी कविता पढ़ी ,आपने ऐसे शब्दों को चुना है जो कि आपकी कविता के भावों को व्यक्त करने में सशक्तता से आपके साथ खड़े हैं......."
प्रणव सक्सैना amitraghat.blogspot.com

pratibha said...

wah!

Udan Tashtari said...

बहुत सुन्दर भाव!


पलकों में जाग भरे
रेतीले गले....
पूरे चाँद की रात
कलपते..

दूर बहुत दूर
इस बेला कोई
बिरहा गा रहा है....

sangeeta swarup said...

भावपूर्ण अभिव्यक्ति ...सशक्त शब्दों का चयन ...बधाई

मनोज कुमार said...

बहुत अच्छी कविता।

नीरज गोस्वामी said...

पलकों में जाग भरे, रेतीले गले....सुभान अल्लाह....कहाँ से लाती है आप ऐसे लफ्ज़ अपनी रचनाओं में...वाह...आपके ज़ज्बात और लफ़्ज़ों के जादू से बचना ना- मुमकिन है...

नीरज

संजय भास्कर said...

कम शब्दों में बहुत सुन्दर कविता।
बहुत सुन्दर रचना । आभार

ढेर सारी शुभकामनायें.

SANJAY KUMAR
HARYANA
http://sanjaybhaskar.blogspot.com

प्रवीण पाण्डेय said...

सोये दरख्तों को बैराग सिखा रहा है ।

अति सुन्दर भाव ।

शहरोज़ said...

क्या हसीं अंदाज़ है.शब्दों का इतना सटीक चयन वाक़ई , कविता को प्रभावी कर गया!

usha rai said...

ये किसके जी का खालीपन !!! इस भरे पूरे चैत के महीने में ! लगता है कहीं होरी बिरहा गा रहा है !सुंदर कविता के लिए बधाई !चैत पर ही मेरी भी कविता है ! देख लीजियेगा !

shikha varshney said...

खूबसूरत शब्दों से बुनी खूबसूरत कविता

मनोज कुमार said...

बहुत अच्छी प्रस्तुति।
इसे 13.03.10 की चिट्ठा चर्चा (सुबह ०६ बजे) में शामिल किया गया है।
http://chitthacharcha.blogspot.com/

शरद कोकास said...

इसके लिये बस वाह !

अमित said...

ये किसके जी का ...
..
...
...उसी के स्वरों
सुन्दर अभिव्यक्ति।

गौतम राजरिशी said...

"दिवंगत फागुन"...आह! सोचता हूँ अपने एक शेर के मिस्रे की खातिर इस बिम्ब को उधार माँग लूं आपसे।

कापी-राइट है?