
काश
मेरा प्यार
तुम पर
इस तरह बरसता है
जैसे किसी पत्थर पर
लगातार
कोई झरना
गिरता है
काश
तुम्हे कभी बारिश में
किसी वृक्ष की भाँति
भीगने की
कला आ जाये
डॉ अमरजीत कौंके की कविता उनकी पुस्तक अंतहीन दौड़ से साभार
साथ ही आबिदा जो हर समय भली लगतीं हैं
इस दौर में क्या क्या है रुसवाई भी लज़्ज़त भी
काँटा हो तो ऐसा हो चुभता हो तो ऐसा हो
हमसे नही रिश्ता भी हमसे नही मिलता भी
है पास वो बैठा भी धोखा हो तो ऐसा हो
चित्र गूगल
16 टिप्पणियाँ:
अमरजीत जी की रचना अद्भुत है और आबिदा जी...सुभान अल्लाह...दोनों के लिए आपका बहुत बहुत शुक्रिया...
नीरज
आबिदा जी को सुना शाम हसीन हुई.
आनंद ही आनंद !!!!!!!! पारुल जी इस अनहद नाद को खुद सुनने का आनंद ही अलग है .बधाई
bahut hi badiya rachna........ kaash
कौंके जी की रचनायें बहुत अद्भुत होती हैं और अबिदा ---- मज़ा आ गया सुन कर। धन्यवाद ,शुभकामनायें
Bahut hi khoobsoorat khyaal hai ..
अमरजीत जी की कविता गागर में सागर के सामान - बहुत बहुत खूब
बेहतरीन। बधाई।
शाम का रंग और गाढ़ा कर दिया आपने..
गुम हुई जाती है अफ्सुर्दा सुलगती हुई शाम
धुल के निकलेगी अभी चश्म-ए-माहताब से रात
कमाल की अभिव्यक्ति, बधाई
डॉ अमरजीत जी की रचना और उस के साथ आबिदा की गजल...वाह!!
बहुत अच्छी प्रस्तुति! राजभाषा हिन्दी के प्रचार-प्रसार में आपका योगदान सराहनीय है।
Dr. Amarjit Sahab ki rachana bahut gazab ki hai aur Abida Parveen ko sun kar to mughd ho jana tay hi tha ..bahut bahut dhanywaad!
http://kavyamanjusha.blogspot.com/
kavita...aabida...
shukriya.
तुम्हे कभी बारिश में
किसी वृक्ष की भाँति
भीगने की
कला आ जाये
बहुत सुन्दर । मन चट्टान सा सपाट हो गया है । क्या करें, बरसात रुकती ही नहीं ।
parul... sabhi doston tak meri kavita pahunchaane ke liye behadd shukarguzar hun...un sabhi doston ka bhi abhaari hun jinhone apna wakt nikal kar tippni di.....
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