Thursday, December 17, 2009

आबिदा परवीन -अब किसी रोज़ न मिलने के बहाने आओ



...कितना कुछ सुना जाता है ....कभी धुन उलझा लेती है ,कभी गीत के बोल तो कभी कलाकार की गायकी ..... पर आबिदा आपा की आवाज़ सुनते-सुनते फितूरी हो जाना अजब सा है . इनमे कुछ फ़ितूर यहाँ दर्ज़ हुए हैं ... कुछ यूँ ही आवारा हो गए .....


रोज़ गुज़रना उस पुल से
जिसके नीचे दहकता है श्मशान
फिर भी जीवन के प्रति आसक्ति कम नही…
रोज़ होती हैं प्रार्थनाएं प्रत्यक्ष,अप्रत्यक्ष
बार-बार कई बार
फिर भी क्रोध पर वश नही...
दिन जाते जाते पसार जाता है सांझ
औ शाम थमा जाती है रात
कहीं तरस है ,कहीं दरस
कहीं इंतज़ार है तो कहीं वो भी नही……
झूठ के पीछे मुस्कुराता सच
सच की आड़ मे मुँह चिढ़ाता झू्ठ
खुदगर्जों के बीच-बीच कहीं कोई मददगार
बेईमानों के बीच ईमानदार…
बुरे दिन नही रहे
तो अच्छे दिन भी नही रहेंगे की तर्ज़ पर
आहिस्ता-आहिस्ता सरकते वक़्त में
बड़ी सुकून देती है ये.... आवाज़
ये खूबसूरत पाक आवाज़
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आबिदा परवीन
तुमको देखे हुए गुज़रे हैं ज़माने आओ