
मेरे फ़ितूरों की फ़ेहरिस्त का सबसे अज़ीज़ फ़ितूर… चलो इक ताजमहल बोएँ ……जिसे काफ़ी अरसा पहले पोस्ट किया था… समय बहुत गुज़र गया तब से अब तक…आज पन्ने पलटे तो लगा , बहुत सी बाते अपनी अहमियत कभी नहीं खोती……ज़रा से फेर बदल के बाद री-पोस्ट कर रही हूँ………
चलो इक ताज महल बोएँ
अभी हाथो मे जुम्बिश है
अभी सीने मे धड़कन है,
अभी खूं मे रवानी है
चलो इक ताज महल बोएँ
अभी जमुना मे पानी है
अभी पूनम सी रातें हैं
उम्र का चढ़ता दरिया है
चलो इक ताज महल बोएँ
अभी पलकों में परियाँ हैं
अधजगीं आधी रतियाँ हैं
अनकही सारी बतियाँ हैं
चलो इक ताज महल बोएँ
फसल जब लहलहाएगी
बीस-इक साल गुज़रेगें
ज़िन्दगी ढल रही होगी
दिवस अवसानमय होंगे …
अमावस की कठिन घड़ियों में
अपनी धुधलीं आँखों से…
चमकता ताज देखेंगें
तब अपना ख्वाब देखेंगे
अभी हाथों में संबल है
अभी सावन सताता है
अभी तनमन सलोना है
चलो इक ताज महल बोएँ
चित्र साभार









12 टिप्पणियाँ:
तब भी अच्छा लगा था और अब भी!!
अभी जमुना मे पानी है
अभी पूनम सी रातें हैं
उम्र का चढ़ता दरिया है
चलो इक ताज महल बोएँ
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bahut khoob sunder abhivyaki
ख्वाबो को बोना क्या बात है आपने कही है ......सपना सा सलोना लग रहा है बहुत खुब
आमीन....!!!!!!! हम भी आयेंगे मोहतरमा बीस एक साल बाद धुँधलकी आँखों से उस ताज महल को देखने..!
आमीन....!!!!!!! हम भी आयेंगे मोहतरमा बीस एक साल बाद धुँधलकी आँखों से उस ताज महल को देखने..!
bahut sunder
बेहतरीन .
कमाल के शब्द पिरोये हैं आपने इस असाधारण रचना में...गज़ब के भाव हैं...आनंद आ गया...वाह.
नीरज
behad khoobsoorat, behad pyaara.
vakai kuch kavitayein hamesha ke liye hoti hain
समीर जी सा ही खयाल उठा मन में
:)
ताजमहल को लेकर जाने कितना कुछ लिखा गया है अब तक...ग़ज़ल, गीत, कविता, नज़्म...
इस बोने वाली कल्पना तो शायद ही किसी कवि ने की है अब तक..
एक अप्रतिम रचना, पारूल...नहीं, महज तारीफ़ करने की खातिर नहीं कह रहा।
वैसे भी आप जानती हो, इस "मेरे फ़ितुर" का दीवाना हूँ मैं!
amazing poem, great thoughts , excellent words. aal put togather a great poem .. i really enjoyed it reading..
vijay
pls read my new poem "झील" on my poem blog " http://poemsofvijay.blogspot.com
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