Monday, October 13, 2008

फ़ितूर

सुनो ! मुझे बर्फ़ पर मत सुलाना
धूप भी मत जलाना……

पुत्र दूर होंगे, उनकी प्रतीक्षा मत करना…
मेरी देह जल्द फूँक ताप आना…
बहुत देर सहेजने से उपरामता बढ़ती है…

नीयम कर्म करके नाहक ही मुझे कष्ट दोगे…
किसी गरीब की कन्या का विवाह कराना और मुझे मुक्त कर देना …

मै ज़रा जल्दी मे होऊँगी …नया चोला जो पहनना होगा…
मै खुश होऊँगी…तुम भी खुश होना…
अभी बहुत कष्ट है…जानते तो हो…

इन छोटी-छोटी सांसो से मेरा मन नहीं भरता…
और ऊपर वाला एक पूरी गहरी सांस मुझे लेने नहीं देता …
पैतृक जिम्मेवारी है सो इस जन्म गिनी-चुनी, आधी-अधूरी सांसे ही सही…

27 टिप्पणियाँ:

Shuaib said...

क्या मतलब है फ़ितूर का

http://shuaib.in/chittha

विवेक सिंह said...

बेहतरीन !

निरन्तर - महेंद्र मिश्रा said...

शायद मरने वाले की अन्तिम इच्छा ...बहुत ही भावुक रचना .

Parul said...

shuaib

jo samjh na aaye ..jo samjhaaya na jaaye...vahi fituur hai...kahney vaala apney arthon me kahtaa hai..padhney vala apney hisab se arth lagaye....aaney ka shukriyaa
VAISEY
bak rahaa hooN junooN meiN kya kya kuchch
kuchch na samjhe KHuda kare koee..:)

ताऊ रामपुरिया said...

मुझे तो दिल की आवाज लगी आपकी ये रचना और आपकी प्रति टिपणी
बहुत ही सुंदर लगी ! शुभकामनाएं !

Gyandutt Pandey said...

सही।
किसी का कल्याण तो और तृप्ति मुझे मिल जाये!
आदर्श।

Arvind Mishra said...

अन्तिम इच्छा पर अभी ही क्यों -इतनी भी क्या जल्दी आन पडी -इत्मीनान से होती हैं वसीयतें ! पर कहीं कुछ गहरा संवेदित हुआ -मरने के बाद भी बेफिक्र बच्चों की फिक्र !

mehek said...

इन छोटी-छोटी सांसो से मेरा मन नहीं भरता…
और ऊपर वाला एक पूरी गहरी सांस मुझे लेने नहीं देता …
पैतृक जिम्मेवारी है सो इस जन्म गिनी-चुनी, आधी-अधूरी सांसे ही सही
bahut sahi baat kahi,bahutkhub

रंजना [रंजू भाटिया] said...

दिल की बात कह दी है पारुल आपने ..अच्छा लगा या फितूर

Beji said...

पता नहीं मैं बहुत दिन बाद आई हूँ ...या तुमने बहुत समय बाद रूह में स्याई ड़ुबोई है...

neeshoo said...

बहुत ही बेहतरीन रचना । पर जितनी प्रंशसा की जाये कम होगी । क्या कमाल की सोच है ।

शायदा said...

इन छोटी-छोटी सांसो से मेरा मन नहीं भरता…
और ऊपर वाला एक पूरी गहरी सांस मुझे लेने नहीं देता …
पैतृक जिम्मेवारी है सो इस जन्म गिनी-चुनी, आधी-अधूरी सांसे ही सही…

ये रंग अलग है पारुल, लेकिन गहरा है।

Udan Tashtari said...

बेहतरीन रचना ....भावुक!!

रंजना said...

क्या कहूँ पारुल, तुमने तो मुग्ध और निःशब्द कर दिया......बहुत बहुत सुंदर बात कही तुमने.अपनी भी ऐसी ही इच्छा है.इश्वर इसे पूर्ण करें.

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` said...

Abhee jaane ki baatein kiya na karo :-((

Mired Mirage said...

बहुत सुन्दर, परन्तु कुछ पचास वर्ष पहले ही लिख डाली है।
घुघूती बासूती

shyam kori 'uday' said...

"मै खुश होऊँगी…तुम भी खुश होना…"
..... समुद्र मे ढेर-सारे मोती दबे पडे हैं, कृपया उन्हे भी निकालिये, देखकर/पढकर अच्छा लगेगा!

अभिषेक ओझा said...

अपने वसीयत में लिखने लायक लगी ! अच्छी रचना !

Harshad Jangla said...

Parulji
This is something strange of talking to leave the world.
My comment on yr previous blog remain unanswered.
-Harshad Jangla
Atlanta, USA

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

बहुत ही सुंदर अभिव्यक्ति - दुखद है, क्षणिक है पर सुंदर है.

Zakir Ali 'Rajneesh' said...

वसीयत के बहाने एक सुंदर विचार से अवगत होने का सुअवसर प्राप्त हुआ। शुक्रिया।

संवेदनाऍं said...

पारूल जी, पहली बार आपके रचना पर टि‍प्‍पणी कर रहा हूँ। नये वि‍चारों को एक ही बैठक में व्‍यक्‍त कर दि‍या आपने, अच्‍छी कवि‍ता बन पड़ी है, सरल शब्‍दों में वजनदार कवि‍ता, बधाई।

एस. बी. सिंह said...

बहुत सुंदर और भावपूर्ण कविता । धन्यवाद

vimmi said...
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Radhika Budhkar said...

Bahut hi sundar rachna .

Radhika Budhkar said...

bahut hi sundar rachna

कंचन सिंह चौहान said...

bahut hi samvedanshil post Parul..!afasos ki vyastatao.n ke chalte pahale kyo nahi padh paai.