सुनो ! मुझे बर्फ़ पर मत सुलाना
धूप भी मत जलाना……
पुत्र दूर होंगे, उनकी प्रतीक्षा मत करना…
मेरी देह जल्द फूँक ताप आना…
बहुत देर सहेजने से उपरामता बढ़ती है…
नीयम कर्म करके नाहक ही मुझे कष्ट दोगे…
किसी गरीब की कन्या का विवाह कराना और मुझे मुक्त कर देना …
मै ज़रा जल्दी मे होऊँगी …नया चोला जो पहनना होगा…
मै खुश होऊँगी…तुम भी खुश होना…
अभी बहुत कष्ट है…जानते तो हो…
इन छोटी-छोटी सांसो से मेरा मन नहीं भरता…
और ऊपर वाला एक पूरी गहरी सांस मुझे लेने नहीं देता …
पैतृक जिम्मेवारी है सो इस जन्म गिनी-चुनी, आधी-अधूरी सांसे ही सही…
Monday, October 13, 2008
Subscribe to:
Post Comments (Atom)









27 टिप्पणियाँ:
क्या मतलब है फ़ितूर का
http://shuaib.in/chittha
बेहतरीन !
शायद मरने वाले की अन्तिम इच्छा ...बहुत ही भावुक रचना .
shuaib
jo samjh na aaye ..jo samjhaaya na jaaye...vahi fituur hai...kahney vaala apney arthon me kahtaa hai..padhney vala apney hisab se arth lagaye....aaney ka shukriyaa
VAISEY
bak rahaa hooN junooN meiN kya kya kuchch
kuchch na samjhe KHuda kare koee..:)
मुझे तो दिल की आवाज लगी आपकी ये रचना और आपकी प्रति टिपणी
बहुत ही सुंदर लगी ! शुभकामनाएं !
सही।
किसी का कल्याण तो और तृप्ति मुझे मिल जाये!
आदर्श।
अन्तिम इच्छा पर अभी ही क्यों -इतनी भी क्या जल्दी आन पडी -इत्मीनान से होती हैं वसीयतें ! पर कहीं कुछ गहरा संवेदित हुआ -मरने के बाद भी बेफिक्र बच्चों की फिक्र !
इन छोटी-छोटी सांसो से मेरा मन नहीं भरता…
और ऊपर वाला एक पूरी गहरी सांस मुझे लेने नहीं देता …
पैतृक जिम्मेवारी है सो इस जन्म गिनी-चुनी, आधी-अधूरी सांसे ही सही
bahut sahi baat kahi,bahutkhub
दिल की बात कह दी है पारुल आपने ..अच्छा लगा या फितूर
पता नहीं मैं बहुत दिन बाद आई हूँ ...या तुमने बहुत समय बाद रूह में स्याई ड़ुबोई है...
बहुत ही बेहतरीन रचना । पर जितनी प्रंशसा की जाये कम होगी । क्या कमाल की सोच है ।
इन छोटी-छोटी सांसो से मेरा मन नहीं भरता…
और ऊपर वाला एक पूरी गहरी सांस मुझे लेने नहीं देता …
पैतृक जिम्मेवारी है सो इस जन्म गिनी-चुनी, आधी-अधूरी सांसे ही सही…
ये रंग अलग है पारुल, लेकिन गहरा है।
बेहतरीन रचना ....भावुक!!
क्या कहूँ पारुल, तुमने तो मुग्ध और निःशब्द कर दिया......बहुत बहुत सुंदर बात कही तुमने.अपनी भी ऐसी ही इच्छा है.इश्वर इसे पूर्ण करें.
Abhee jaane ki baatein kiya na karo :-((
बहुत सुन्दर, परन्तु कुछ पचास वर्ष पहले ही लिख डाली है।
घुघूती बासूती
"मै खुश होऊँगी…तुम भी खुश होना…"
..... समुद्र मे ढेर-सारे मोती दबे पडे हैं, कृपया उन्हे भी निकालिये, देखकर/पढकर अच्छा लगेगा!
अपने वसीयत में लिखने लायक लगी ! अच्छी रचना !
Parulji
This is something strange of talking to leave the world.
My comment on yr previous blog remain unanswered.
-Harshad Jangla
Atlanta, USA
बहुत ही सुंदर अभिव्यक्ति - दुखद है, क्षणिक है पर सुंदर है.
वसीयत के बहाने एक सुंदर विचार से अवगत होने का सुअवसर प्राप्त हुआ। शुक्रिया।
पारूल जी, पहली बार आपके रचना पर टिप्पणी कर रहा हूँ। नये विचारों को एक ही बैठक में व्यक्त कर दिया आपने, अच्छी कविता बन पड़ी है, सरल शब्दों में वजनदार कविता, बधाई।
बहुत सुंदर और भावपूर्ण कविता । धन्यवाद
Bahut hi sundar rachna .
bahut hi sundar rachna
bahut hi samvedanshil post Parul..!afasos ki vyastatao.n ke chalte pahale kyo nahi padh paai.
Post a Comment