Thursday, March 27, 2008

अनुभूति में प्रकाशित -- फागुनी बयार में, गीत

,

अनुभूति के होली अंक मे प्रकाशित मेरा गीत --

चैत की गुहार पे ,
फागुनी बयार में
मद भरे झुके नयन
प्रिय तुम्हारी आस में
टेसुओं के फूल से
बूंद बूंद घुल रहे ।


चहुं दिशा अबीर है
फाग का खुमार है
ढोलकी की थाप पर
प्रिय तुम्हारी राह में
ये रुके रुके कदम
डगमगाए चल रहे ।

प्रीत का गुलाल है
व्याकुल मन प्राण है
हूक हीय उठ रही
प्रिय तुम्हारी चाह मे
ओढ़नी की ओट में
साँस साँस जल रही ।


http://www.anubhuti-hindi.org/sankalan/holi/parul.htm

16 टिप्पणियाँ:

Beji said...

वाह!!

kush said...

bahut sundar bhaav.... badhaai swikar kare

Udan Tashtari said...

बहुत खूब!!

vimmi said...

holi beet gai per fir bhi padh ka holi ka lutf aa gaya apne up ki holi yaad aa gai ....bahut khoob....mashallah.........

राकेश खंडेलवाल said...

प्रिय तुम्हारी चाह मे
ओढ़नी की ओट में
साँस साँस जल रही ।

सुन्दर अभिव्यक्ति है

mehek said...

चहुं दिशा अबीर है
फाग का खुमार है
ढोलकी की थाप पर
प्रिय तुम्हारी राह में
ये रुके रुके कदम
डगमगाए चल रहे ।
bahut sundar

yunus said...

सुंदर बहुत सुंदर । होली देर से ही सही मुबारक

जोशिम said...

बहुत ही मंद छंद बयार लिखी है - और गाई भी बहुत ही बहुत अच्छी है - बधाई

Gyandutt Pandey said...

बहुत स्तरीय रचना है जी। बधाई।

ajay kumar jha said...

bahut dino baad kuchh bahut achha padhne ko mila . utkrisht rachna hai.

सुनीता शानू said...

अनुभूति पर पढा था...आनंद आ गया...

प्रीत का गुलाल है
व्याकुल मन प्राण है
हूक हीय उठ रही
प्रिय तुम्हारी चाह मे
ओढ़नी की ओट में
साँस साँस जल रही ।

मीनाक्षी said...

सुर और स्वर दोनो ही रसभरे. शुभकामनाएँ

Sanjay Gulati Musafir said...

शब्दों को मधुर कहूँ या गुनगुनाती आवाज़ को।

मग दोनों ही के लिए धन्यवाद।

संजय गुलाटी मुसाफिर

DR.ANURAG ARYA said...

बहुत बढ़िया .....

Dr. Chandra Kumar Jain said...

अनुभूति में प्रकाशित
आपकी यह रचना
अपने आप में प्रकाशित
अनुभूति भी है.

सुकोमल भावों की
सुंदर-सरस-सहज अभिव्यक्ति !
धन्यवाद.

कंचन सिंह चौहान said...

aaaha kya baat hai.. .! aaj padha to chaitra me fir se fagum aa gaya