Monday, March 3, 2008

रातों को चोरी-चोरी

अजब उलझन है, बचपन से आज तक कोई फ़र्क नहीं । भविष्य में सुलझने की भी कोई उम्मीद नहीं। एक सुर चढ़ जाये तो बस ….…क्या करें अब कुछ पसंद आ गया तो आ गया अब इसमें मेरा नसीब अच्छा या दूसरों का खराब ? इस बारे मे मै चुप रहूंगी । काम वाली बाई कहती है मेम साहब सुबह को आयी थी तब से सांझ हो गयी आप अब तक यही यूनुस सुन रहीं हैं ? बेटा कहता है माँ अब बस करो ,कब तक इरफ़ान मे इन जनाब को बुलवाती रहोगी ,ये भी तो थक जाते होंगे । लेकिन पुरानी बीमारियाँ जल्द जाती नहीं बाज़ दफ़ा तो आखिरी साँस तक साथ निभाती हैं । कभी कभार मेहमान आने पर volume थोड़ा धीमा ज़रूर हो जाता है मगर मीत को सुनती तब तक रहती हूं जब तलक मन ना भर जाये । घर तो घर कार मे भी पसंदीदा गाने replay करनें से मुझे कोई आपत्ति नहीं हालांकि साथ वालों को अकसर हो जाती है । बड़े बुज़ुर्ग आस पास हो तो कबाड़खाना मे मन पसंद संगीत 7-8 दफ़ा सुनकर तृप्ति पा ही लेती हूं । पढ़ने वाले अबतक पक्का मुझे सनकी समझ चुके होंगे । खैर अब क्या किया जाये सुधरने की कोई ललक भी तो नही । जब तक बेहतरीन संगीत बनता रहेगा ,लोग सुनाते रहेंगे तब तलक मेरा ये दीवानापन यूँ ही क़ायम रहेगा……अपना कच्चा-चिट्ठा इस प्रकार बखान करने का श्रेय प्रमोद जी के बैकग्राउंड मे बज रहे इस गीत को देना चाहती हूं ,जिसे esnips पे ढ़ूंढ़कर अनगिनत बार सुन चुकी हूँ । "मोहब्‍बत ज़िंदगी है " फ़िल्म चाहे कैसी भी हो "आशा " की आवाज़ मे गीत नायाब है । अब मुझे ये गीत इतना पसंद क्यों आया कहना नामुमकिन बस जी भर के सुनती रहूंगी जब तक आस पास लोग त्राहि माम-त्राहि माम न कहने लगें ……आप भी सुनिये……



11 टिप्पणियाँ:

गुस्ताखी माफ said...

वाकई नायाब

डॉ. अजीत कुमार said...

पारुल जी,
आपने सच ही कहा जब सुर चढ़ जाता है न तो दूसरा कोई भी गाना बजता रहे हम तो उसी गाने को गुनगुनायेंगे या सुनेंगे. जिस गाने को आपने सुनवाया " रातों को चोरी चोरी..." ये भी कुछ ऐसा ही है,अगर यूनुस भाई के शब्दों में कहूं तो - संक्रामक गीत.
अच्छे गाने के लिए धन्यवाद.

yunus said...

ये गीत मुझे और खासकर मेरी पत्‍नी को बहुत पसंद है । नायाब गीत । संक्रामक गीत । सदाबहार गीत

Udan Tashtari said...

एक और उम्दा प्रस्तुति..आभार गीत सुनवाने का.

ajay kumar jha said...

aapkee lekhnee aur gane kaa double pack achha lagaa. dhanyavaad.

कंचन सिंह चौहान said...

mai to pahale hi udghoshana kar cuki hu.n ki aap jo sune.ngi vo best hi hoga....! aap jo yunus ji, irfaan aur meet ji ki posts ke sath karti hai.n vo ham aap ke bhi sath karte hai.n

uttam geet..ek alag era me le jane vala.

mehek said...

bahut aalag bahut sundar geet.

मीत said...

काश ये उलझन कभी न सुलझे. न कभी ये नशा उतरे. सनक है तो सनक सही.... इस पार लोग हैं न .... झरना बहता रहे बेफ़िक्री से, बस इस बात की फ़िक्र ज़रूरी है.

जोशिम said...

बहुत सही - हम तो पहले देख आए वैसे सर्वेश्वर जी ने लिखा है - "लीक पर वे चलें जिनके/ चरण दुर्बल और हारे हैं,/ हमें तो जो हमारी यात्रा से बने/ ऐसे अनिर्मित पन्थ प्यारे हैं ।/"- rgds manish

mamta said...

पारुल जी शुक्रिया इसे सुनवाने के लिए। बेहद पसंद आया।

Manish said...

जबरदस्त..दिल खुश कर दिया आपने