
प्राणप्रन से हो निछावर
बंदिनी जब कर लिया,
अंकुशों के श्राप से फिर
प्रीत को बनबास क्यों …
मौन हो जाये समर्पण
शेष सब अधिकार हों,
नेह का बंधन डगर की
बेड़ियाँ बन जाये क्यों…
मोह के संसार की
काँटों भरी पगडंडियाँ,
नग्न पैरों की जलन पर
प्रणय का गुणगान क्यों…
सांझ के मद्धम दिये सी
ये ऊषा की लालिमा,
भोर के पहले चरण मे
मेही कहीं खो जाये क्यों…
छटपटाती देह में
श्वासों का ये आवा गमन,
वेदना के… ताल-स्वर पर
व्यथित मन का गान क्यों……
प्राणप्रन से हो निछावर
बंदिनी जब कर लिया
प्रेमपूरित नयन फिर
रह-रह सजल हो जाएं क्यों………
10 टिप्पणियाँ:
अति सुन्दर …अंकुशो के श्राप से प्रीत को वनवास क्यों,,,,बहुत अच्छे
प्राणप्रन से हो निछावर
बंदिनी जब कर लिया,
अंकुशों के श्राप से फिर
प्रीत को बनबास क्यों …
प्राणप्रन से हो निछावर
बंदिनी जब कर लिया
प्रेमपूरित नयन फिर
रह-रह सजल हो जाएं क्यों………
BAHUT HI GAMBHIR BHAV
अच्छी कविता . सच्चे प्रश्न .
बहुत बढ़िया.
छटपटाती देह में
श्वासों का ये आवा गमन,
वेदना के… ताल-स्वर पर
व्यथित मन का गान क्यों……
बहुत सुंदर !!
पारुल ,
महादेवी जी शैली याद हो अयी -सशक्त काव्य के लिये,
बधाई !
-लावण्या
अति उत्तम, सुन्दर रचना! बधाई.
सांझ के मद्धम दिये सी
ये ऊषा की लालिमा,
भोर के पहले चरण मे
ही कहीं खो जाये क्यों…
उत्कॄष्ट रचना. ऐसे ही लिखते रहें
कुश की कॉफी के बाद यहाँ ... बहुत सुन्दर उच्च कोटि की रचना...लावण्या जी को महादेवी वर्मा याद आईं तो हमें प्रसाद और उनकी कामायनी याद आ गई....
Meenakshi ji wala rasta humne bhi pakda aur jaise ki umeed thi is post par aana vyartha nahin gaya
behad sundar rachna...
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