Sunday, October 25, 2009

घट घट में पंछी बोलता-वीणा सहस्रबुधे-येसुदास


भोर के स्वर हैं...
ईश है...
आशीष है ..

दो गीत अलग अलग आवाजों में ...

घट घट में पंछी बोलता
आप ही डंडी आप तराजू
आप ही बैठा तौलता ...
स्वर--वीणा सहस्रबुधे



ज़िंदगी को संवारना होगा
दिल में सूरज उतारना होगा
स्वर -येसुदास

Friday, October 23, 2009

दो बातें




खिंची हुई नस,
घूमी हुई फिल्ली की तरह
आहत विश्वासों से
उठने वाले एहसास,
रह-रह टीस देते हैं
निरंतर...

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तुम विश्वस्त थे नही
सो आश्वस्त हो
जीने का सुख
भी ईश्वर ने तुम्हे दिया नहीं
सब पा कर भी
कितने दरिद्र रहे,
मित्र मेरे

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फिल्ली -पैर के घुटने और पंजे के मध्य का भाग ..जिसमे अकसर नस खिंचने के कारण असहनीय दर्द होता है.

चित्र -गूगल

Tuesday, October 20, 2009

सुबह की सैर कुछ चित्र/आयो प्रभात/राजन साजन मिश्र

आज सुबह की सैर- कुछ चित्र

नया सूर्य
नयी आशा
नया विश्वास
एक नया दिन

साथ ये बंदिश राजन साजन मिश्र व एस जानकी के स्वरों में

आयो प्रभात सब मिल गाओ
बजाओ नाचो हरी को रिझाओ



चित्र क्लिक करके बड़े आकार में देखे जा सकते हैं




Saturday, October 10, 2009

इक शब



बहुत रोया हुआ बच्चा सिसक कर जैसे सो जाये
तेरे शानों पे मैने उस तरह इक शब गुज़ारी है





चित्र- गूगल साभार

Tuesday, October 6, 2009

चौथ के चंदा सुनो तुमको हमारी सौंह लगे


दो बरस से बारिशों के कारण करवा चौथ का व्रत हम टीवी देख कर तोड़ते हैं ……हमारे यहाँ दूज,तीज सबका चाँद बड़ी रौनकों के साथ खिलता है…मगर चौथ के चाँद को आँखें तरस जाती हैं……सो एक नज़्म/फ़ितूर उनके नाम



आह !
देखो तो खिला है चाँद कैसा तीज का
चौथ का होता भला तो इस तरह देता दरस ?
ढूंढ़ते फिरते अटारी ,आंगना,घर द्वार हम
ताकते रहते उचक कचनेरियों के पार हम
देखते, अटका न हो वो बदलियों की आड़ में
या फिसल कर गिर गया हो बेरियों के झाड़ में
इक झलक के वास्ते पूछो न क्या करते जतन
और वो फुर्सत में रह- रह ढा रहा होता सितम…
चौथ के चंदा सुनो तुमको हमारी सौंह लगे
इस बरस खिलना
न करना तुम कोई अठखेलियाँ
साल भर मौके -बेमौके हम मना लेंगे तुम्हे
हम ख़फा हो जायेंगे जो, तुम मना न पाओगे
और चेताये दे रहें है रूठ कर गर हम गए

क्या पता फिर पूजने लग जाएँ चंदा तीज का…




पिछ्ले साल इसी मौक़े पर की गयी पोस्ट यूँ सजा चाँद, यहाँ सुने अबिदा परवीन की आवाज़ में

चित्र-साभार गूगल

Monday, October 5, 2009

इतना काफ़ी है अंतिम दस्तक पर, खुद दरवाज़ा खोलें/अटलजी/जगजीत सिंह


पिछले दिनों कई बार वृद्ध ग्राम ब्लॉग पर जाना हुआ .... वहीं से याद आयी इस गीत की ....ये कविता कैसे- कहाँ जोड़ती /हैरान करती है मुझे.... कहना मुश्किल... गीत की ये एक पंक्ति बार- बार ज़ेहन में उभरती / गूँजती है .. इतना काफ़ी है अंतिम दस्तक पर, खुद दरवाज़ा खोलें!.....
कुछ अरसा पहले भी जगजीत सिंह का एक अलग मिज़ाज का गीत यहाँ पोस्ट किया था ....बुझ गई तपते हुए दिन की अगन


क्या खोया, क्या पाया जग में
कविता-अटल बिहारी वाजपेयी
स्वर-जगजीत सिंह
कमेंट्री -अमिताभ बच्चन



क्या खोया, क्या पाया जग में
मिलते और बिछुड़ते मग में
मुझे किसी से नहीं शिकायत
यद्यपि छला गया पग-पग में
एक दृष्टि बीती पर डालें, यादों की पोटली टटोलें!
अपने ही मन से कुछ बोलें!

पृथ्वी लाखों वर्ष पुरानी
जीवन एक अनन्त कहानी
पर तन की अपनी सीमाएँ
यद्यपि सौ शरदों की वाणी
इतना काफ़ी है अंतिम दस्तक पर, खुद दरवाज़ा खोलें!
अपने ही मन से कुछ बोलें!

जन्म-मरण का अविरत फेरा
जीवन बंजारों का डेरा
आज यहाँ, कल कहाँ कूच है
कौन जानता किधर सवेरा
अंधियारा आकाश असीमित,प्राणों के पंखों को तोलें!

अपने ही मन से कुछ बोलें!

चित्र घर के बाहर एक धुंधलाती शाम का

Thursday, October 1, 2009

दोस्त


क्या रूठ गया है
तुमसे…तुम्हारे वजूद में?
ये ख़फ़गी किस से… और क्यों है ?
ये कैसा सोग़ ?
जो ख़त्म होने नही आता …
एक उम्र से उदास और बहुत उदास दिखते हो
ख़ामोशी पर्त दर पर्त जमती जा रही है
तुम सिमटते जा रहे हो…
सब्र की एक हद है
देखो
मेरी मानो तो आज

थोड़ा रो लो……



चित्र साभार गूगल