Monday, November 23, 2009

दुआ करना


किसी मित्र से बात हो रही थी पंजाब के बारे में .पंजाब की मिट्टी के बारे ...मै कह बैठी बड़ा मन है "हीर " का हिन्दी अनुवाद पढ़ सकूँ किसी रोज़ .. गा सकूँ उसी शिद्दत से ......बोले दोस्त "हीर" पढ़ने /समझने के लिए हीर बनना पड़ेगा पहले ....बात आई -गई हो गई मगर मन में बार-बार कौंधती रही के हीरें तो उतरती हैं ..हीरें बनाई -बिगाड़ी कैसे जाएँ ?

एक फ़ितूर

ओ लड़की ,
दुआ करना ...
अस्पताल जाते वक़्त कहा था उसने
मै जुनूनी हो गया हूँ
मेरे वास्ते दुआ करना
औ देखना,
जो ठीक होकर आऊँगा
तुम्हे बिल्कुल भूल जाऊँगा
ओ लड़की दुआ करना
मेरे वास्ते दुआ करना..
वो लड़की
कतरा -कतरा घुलती रही
वो लड़की
मुसलसल दुआ करती रही..


चित्र -गूगल

Tuesday, November 17, 2009

नवम्बर की बारिश


मित्र ने कहा खेतों के लिए
मुफ़ीद...बारिश
मिस्त्री कहे.. ढलाई की भलाई
आँगन का कोना,
सूख-सूख भीजे
बूँदें अटपटी
टप- टप
भूल चूक बरस जाएँ
यहाँ वहाँ ...
आसमान सुबक -सुबक..
ले डूबें दिन
बादल घनेरे न जाने
कहाँ कहाँ...
छज्जे के ऊपर का मैल..निरा
बुहार लाई
थकी थकी
अकेली उदास
नवम्बर की बारिश
....

Sunday, November 15, 2009

ग़ालिब /रफी /जगजीत


आह को चाहिये इक उम्र असर होने तक
ग़ालिब
स्वर -जगजीत सिंह
नुक्ताचीं है ग़म-ए-दिल उस को सुनाये न बने
ग़ालिब
स्वर- रफ़ी

इस पोस्ट में कुछ और कहने की गुंजाइश नही…… सिवाय इसके कि दोनों ही ग़ज़लें ख़ूब सुनी हुई हैं और एक ख़त्म होते ही दूसरी सुन ने की ललक होती है …




आह को चाहिये इक उम्र असर होने तक
कौन जीता है तेरी ज़ुल्फ़ के सर होने तक


दामे-हर-मौज में हैं हल्क़-ए-सदकामे-निहंग
देखें क्या गुज़रे है क़तरे पे गुहर होने तक

आशिक़ी सब्र-तलब और तमन्ना बेताब
दिल का क्या रंग करूँ ख़ून-ए-जिगर होने तक

हम ने माना के तग़ाफ़ुल न करोगे लेकिन
ख़ाक हो जायेंगे हम तुम को ख़बर होने तक


पर्तौ-ए-खुर से है शबनम को फ़ना की तालीम
मैं भी हूँ एक इनायत की नज़र होने तक

यक नज़र बेश नहीं फ़ुर्सत-ए-हस्ती ग़ाफ़िल
गर्मी-ए-बज़्म है इक रक़्स-ए-शरर[१] होने तक

ग़मे-हस्ती का 'असद' किस से हो जुज़ मर्ग [२]इलाज
शम्म'अ हर रंग में जलती है सहर होने तक

शब्दार्थ:
1. ↑ चिंगारी का नृत्य
2. ↑ मृत्यु के अतिरिक्त




नुक्ताचीं है ग़म-ए-दिल उस को सुनाये न बने
क्या बने बात जहाँ बात बनाये न बने


मैं बुलाता तो हूँ उस को मगर ऐ जज़्बा-ए-दिल
उस पे बन जाये कुछ ऐसी कि बिन आये न बने

खेल समझा है कहीं छोड़ न दे, भूल न जाये
काश यूँ भी हो कि बिन मेरे सताये न बने


ग़ैर फिरता है लिए यूँ तेरे ख़त को कि अगर
कोई पूछे कि ये क्या है तो छुपाये न बने

इस नज़ाकत का बुरा हो वो भले हैं तो क्या
हाथ आयें तो उन्हें हाथ लगाये न बने

कह सके कौन कि ये जल्वागरी किसकी है
पर्दा छोड़ा है वो उसने कि उठाये न बने

मौत की राह न देखूँ कि बिन आये न रहे
तुम को चाहूँ कि न आओ तो बुलाये न बने

बोझ वो सर पे गिरा है कि उठाये न उठे
काम वो आन पड़ा है कि बनाये न बने

इश्क़ पर ज़ोर नहीं, है ये वो आतिश "ग़ालिब"
कि लगाये न लगे और बुझाये न बने

Sunday, October 25, 2009

घट घट में पंछी बोलता-वीणा सहस्रबुधे-येसुदास


भोर के स्वर हैं...
ईश है...
आशीष है ..

दो गीत अलग अलग आवाजों में ...

घट घट में पंछी बोलता
आप ही डंडी आप तराजू
आप ही बैठा तौलता ...
स्वर--वीणा सहस्रबुधे



ज़िंदगी को संवारना होगा
दिल में सूरज उतारना होगा
स्वर -येसुदास

Friday, October 23, 2009

दो बातें




खिंची हुई नस,
घूमी हुई फिल्ली की तरह
आहत विश्वासों से
उठने वाले एहसास,
रह-रह टीस देते हैं
निरंतर...

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तुम विश्वस्त थे नही
सो आश्वस्त हो
जीने का सुख
भी ईश्वर ने तुम्हे दिया नहीं
सब पा कर भी
कितने दरिद्र रहे,
मित्र मेरे

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फिल्ली -पैर के घुटने और पंजे के मध्य का भाग ..जिसमे अकसर नस खिंचने के कारण असहनीय दर्द होता है.

चित्र -गूगल

Tuesday, October 20, 2009

सुबह की सैर कुछ चित्र/आयो प्रभात/राजन साजन मिश्र

आज सुबह की सैर- कुछ चित्र

नया सूर्य
नयी आशा
नया विश्वास
एक नया दिन

साथ ये बंदिश राजन साजन मिश्र व एस जानकी के स्वरों में

आयो प्रभात सब मिल गाओ
बजाओ नाचो हरी को रिझाओ



चित्र क्लिक करके बड़े आकार में देखे जा सकते हैं




Saturday, October 10, 2009

इक शब



बहुत रोया हुआ बच्चा सिसक कर जैसे सो जाये
तेरे शानों पे मैने उस तरह इक शब गुज़ारी है





चित्र- गूगल साभार